गौतम ने देवराज इंद्र को अहिल्या के दोषी ठहराते हुए ऋषि समाज से न्याय की गुहार लगाई परंतु किसी मे भी इंद्र को दंडित करने का साहस नहीं था। स्वयं विश्वामित्र भी वहाँ उपस्थित थे पर उन्होंने भी इंद्र के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। इस बात ग्लानि उन्हें वर्षों से कोंच रही थी। उन्होंने उस समय कुछ न कर पाने का अपराध राम लक्ष्मण के सम्मुख स्वीकार किया।