'जिंदगी' मेरी स्वरचित प्रेरणास्पद कविता है।। जिंदगी,सुबह का शाम में ढलते जाना
आना-जाना योंही फ़सानें बन जाना
किसी का मिलना तो किसी का बिछड़ जाना
कभी कहानी तो कभी गज़ल बन जाना
कभी आँसू तो कभी आशाओं से भर जाना
कभी सपनों सी सुंदर तो कभी बेरहम हो जाना
चंद लम्हों का साँसों में ढल जाना
किसी का होके उसे अपना बनाना
यादों के पन्नों का पुलंदा बन जाना
यह वक्त की जादूगरी है जितना मैंने जाना
एक दिन इसको खत्म है हो जाना
जिंदगी, सुबह का शाम में ढ़लते जाना।
- महेश कुमार