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Description

दिनकर जी ने कहा था एक नहीं दो दो मात्राएँ नर से भारी नारी। जयशंकर प्रसाद दम कहा-नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नभ पग तल में , पीयूष स़़्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।  हमारा हिंदी साहित्य भरा पड़ा है ऐसे अनेक सूक्तियों सूत्रों कविताओं व लेखों से पर क्या नारी को उसका वह स्थान मिल पाया है जिसकी वह हकदार है? कुछ मेरे मित्र हाँ भी कह सकते है पर बहुत ऐसे मिलेंगे जो हाँ कहने में थोड़ा हकलाएँगे। आखिर क्यों? कई बार मेरा मन अपने आप से प्रश्न भी करता है कि आखिर क्या कारण है कि महिला को अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए महिला दिवस मनाने की जरूरत पड़ रही है? शायद इसका कारण स्वयं नारी ही है। आप मुझसे सहमत हो तो यह कहानी आपके लिए और असहमत हों तब तो यह कहानी आपके लिए ही है।अपने विचार मुझे shradha.pdy@gmail.com पर भेजिए। 

लोगों से मिली प्रसंशा की झलकियां 

Awesome story and Kudos to your unique style of narration. I felt as if the whole story is being picturised in front of my eyes and all the characters are playing live in front of me. Truly amazing ma'am 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

👌👌👌Wow Lovely share . Just heard the first story today . It was marvellous ! After such a long time I have heard a lovely story