Listen

Description

 कितने ही लोग शहर इस उम्मीद से आते हैं कि शहर में पैसा कमाकर वापस घर चले जाएँगे शहर की सड़क कभी गाँव की तरफ नहीं मुड़ती इसलिए शायद ही कोई लौट पाया है। शहरी मायाजाल में फँसा आदमी तड़पता तो रहता है पर निकल नहीं पाता। जो निकल जाता है या निकल जाने का प्रयास करता है वह सच्चे अर्थों में जी जाता है वरना कोल्हू के बैल की तरह निरंतर गोल-गोल घूमता जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने खाली हाथों को देख सिर्फ पछताता रहता है।

अगर आपको मेरी कहानी अच्छी लगे तो shradha.pdy@gmail पर संदेश भेजकर मेरा मार्गदर्शन कीजिए