यदि आप पढ़ने के शौकीन हैं तो आप मेरी यह कहानी जुलाई माह की " सखी " पत्रिका में पढ़ सकते हैं।
कहानी से -----सुनयना अपने कमरे में बिस्तर पर औंधी लेटी आँसू बहाते हुए सोच रही थी कि क्या हर रिश्ते को नाम देना जरूरी है ? क्या दो अलग-अलग उम्र व लिंग के लोग मित्र नहीं हो सकते ?सुनयना अपने अंतर्द्वंद्व में उलझी थी कि अचानक अपने सामने शशांक को पाकर घबरा गई। शशांक ने बड़े अधिकार से कहा
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