प्रायः आपको अपने आस-पास ऐसी स्त्रियाँ मिल जाएँगी जो परिवार के हित के लिए सब कुछ स्वाहा करके भी खाली हाथ रह जाती हैं। यदि आवाज़ उठाती हैं तो न जाने कितने विशेषणों से परिभाषित की जाती हैं और चुपचाप सहती जाती हैं तो स्वयं कुंठा का शिकार होती रहती हैं। आवश्यकता है तो संतुलन की। इस संतुलन को बनाए रखने में सभी का योगदान होना चाहिए न कि केवल और केवल स्त्री का।
मेरी टीेस कहानी ने आपको भी टीस का अहसास कराया हो तो अपने कहानी सुनने के शौकीन मित्रों के साथ सांझा जरूर कीजिएगा तथा अपने विचार shradha.pdy@gmail.com पर लिखने का कष्ट कीजिएगा। जल्द ही मिलेंगे अपनी लिखी एक और कहानी के साथ
तब तक आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में---