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गजल ...... डॉ.प्रदीप शिंदे

आज कफन लपेटकर, बेखौफ चल दिया
रोज मौत से घबराकर जीना छोड़ दिया

दिन भर रास्ते पर, धुप में खडा रहा मैं
दरख़्त बनकर, शितल छांव देता रहा मैं

मेरे दिल में दर्द कहां होता हैं आजकल
मैं दर्द की दवा बना ,बांटता हूं आजकल

होड़ में पिछे रह कर, हरदम हार जाता हूं
किसी की खुशी का जरिया बन जाता हूं

लोग मंदिर दरगाह बनाके खुदा ढूंढते हैं
मैं मंदिर दरगाह, मुझमें ख़ुदा मिलता हैं

दीया अंधकार को मिटाकर बुझ जाता हैं
मैं स्वयं दीपक, नित्य प्रकाशमान रहता हूं

लोग मंजिल को पाने सीढीयां पर चलते हैं
मैं सिढी बनकर,मंजिल तक लेकर जाता हूं

,प्यासा पानी की तलाश में भटकता रहता हैं
मैं बादल,बरस कर प्यास बुझाना चाहता हूं
डॉ.प्रदीप शिंदे