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Description

विश्वास नहीं होता

मेरी आँखों को

कि नीले आसमान से ढकी

यह मेरी दिल्ली है !

ये तो मेरे बचपन का कोई सपना जान पड़ता है !

मैंने कब के बीत चुके बचपन में ही

देखा था

यही नीला आसमान!

मेरे बचपन में

चाँद- तारों से भरी चादर ओढ़कर

यही नीला आसमान

रात भर सकून देता था मेरे मन को !

रात के स्याह अंधेरे से

कभी डर भी नहीं लगता था !

याद है अब भी मुझे

चाँद तारों की रोशनी में

घर - मोहल्ले में की धमाचौकड़ी,

छुटपन की ढेर - सी शरारतें !

कभी कहा नहीं था

माँ  या बाबूजी ने

कि

‘बाहर न जा , अंधेरा है ! ‘

वही दिन क्या लौट आए हैं ?

आसमान फिर से नीला हो गया है

रात चाँद तारों की बारात लिए

अब रोज़ आती है !

पर ये क्या ?

बच्चों की किलकारियाँ

कहीं दूर तक सुनाई नहीं पड़ती !

इतना ख़ुशनुमा माहौल है

लेकिन

सूनापन क्यों छाया है चारों तरफ़ ?

बड़ा भयावह लगता है

रात का अंधेरा अब !

हर ओर डर का पहरा है !

ये क्या हो गया है ?

सब कुछ पहले जैसा है

फिर भी ख़ौफ़ क्यों है चारों तरफ़ ?

मैं विरासत में ये क्या सौंप रहा हूँ

अपने ही नए रूप को !

मेरे नाती -पोते क्या

मेरे नए रूप में यही दिन देखने को आए हैं ?

मुझे आगे बढ़कर कुछ करना होगा ,

मुझे ही नहीं हम सबको अब सोच बदलनी होगी!

इस नीले आसमान को भी

नीला ही रहना होगा

इस चाँदनी रात को

यूँ ही जगमगाना होगा !

—- यह होड़ की दौड़ मुझे रोकनी होगी !

तरक़्क़ी के साथ -साथ

मुझे जीने की

नई राह खोजनी होगी !

मुझे चाँद-तारों

और नीले आसमान को

यहीं टिके रहने को

विवश करना होगा !

मुझे विरासत में

अपने बचपन का आसमान ही

अपनी नई पीढ़ी को सौंपना होगा !

—-अश्विनी कपूर