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Description

Sammed Shikhar Stuti सम्मेद शिखर स्तुति ★
चिन्मूरति चिंतामणि, चिन्मय ज्योतीपुंज।
मैं प्रणमूं नित भक्ति से, चिन्मय आतमकुंज ।।१ । ।

- शंभु छन्द -
जय जय सम्मेदशिखर पर्वत, जय जय अतिशय महिमाशाली।
जय अनुपम तीर्थराज पर्वत, जय भव्य कमल दीधितमाली१।।

जय कूट सिद्धवर धवलकूट, आनंदकूट अविचलसुकूट ।
जय मोहनकूट प्रभासकूट, जय ललितकूट जय सुप्रभकूट ।।२ ।।

जय विद्युत संकुलकूट सुवीरकूट स्वयंभूकूट वंद्य ।
जय जय सुदत्तकूट शांतिप्रभ, कूट ज्ञानधरकूट वंद्य ।।
जय नाटक संबलकूट व निर्जर, कूट मित्रधरकूट वंद्य ।
जय पाश्र्वनाथ निर्वाणभूमि, जय सुवरणभद्र सुकूट वंद्य ।।३।।

जय अजितनाथ संभव अभिनंदन, सुमति पद्मप्रभ जिन सुपाश्र्व।
चंदाप्रभु पुष्पदंत शीतल, श्रेयांस विमल व अनंतनाथ ।।
जय धर्म शांति कुंथू अरजिन, जय मल्लिनाथ मुनिसुव्रत जी ।
जय नमि जिन पाश्र्वनाथ स्वामी, इस गिरि से पाई शिवपदवी।।४।।
केलाशगिरी से ऋषभदेव, श्री वासुपूज्य चंपापुरि से । गिरनारगिरी से नेमिनाथ, महावीर प्रभू पावापुरि से ।।
निर्वाण पधारे चउ जिनवर, ये तीर्थ सुरासुर वंद्य हुए।
हुंडावसर्पिणी के निमित्त ये, अन्यस्थल से मुक्त हुए || ५ ||
जय जय कैलाशगिरी चंपा, पावापुरि ऊर्जयंत पर्वत।
जय जय तीर्थंकर के निर्वाणों, से पवित्र यतिनुत पर्वत ।।
जय जय चौबीस जिनेश्वर के, चौदह सौ उनसठ गुरु गणधर।
जय जय जय वृषभसेन आदी, जय जय गौतम स्वामी गुरुवर ।।६।।
सम्मेदशिखर पर्वत उत्तम, मुनिवृंद वंदना करते हैं ।
सुरपति नरपति खगपति पूजें, भविवृंद अर्चना करते हैं ।।
पर्वत पर चढ़कर टोंक-टोंक पर, शीश झुकाकर नमते हैं ।
मिथ्यात्व अचल शतखंड करें, सम्यक्त्वरत्न को लभते हैं ।।७।।
इस पर्वत की महिमा अचिन्त्य, भव्यों को ही दर्शन मिलते।
जो वंदन करते भक्ती से, कुछ भव में ही शिवसुख लभते ।।
बस अधिक उनंचास भव धर, निश्चित ही मुक्ती पाते हैं।
वंदन से नरक पशूगति से, बचते निगोद नहिं जाते हैं ||८||
दस लाख व्यंतरों का अधिपति, भूतकसुर इस गिरि का रक्षक ।
यह यक्षदेव जिनभाक्तिकजन, वत्सल है जिनवृष का रक्षक।।
जो जन अभव्य हैं इस पर्वत का, वंदन नहिं कर सकते हैं।
मुक्तीगामी निजसुख इच्छुक, जन ही दर्शन कर सकते हैं ||९ | |
यह कल्पवृक्ष सम वांछितप्रद, चिंतामणि चिंतित फल देता ।
पारसमणि भविजन लोहे को, कंचन क्या पारस कर देता ।।
यह आत्म सुधारस गंगा है, समरस सुखमय शीतल जलयुत ।
यह परमानंद सौख्य सागर, यह गुण अनंतप्रद त्रिभुवन नुत । ।१० ।।
मैं नमूँ नमूँ इस पर्वत को, यह तीर्थराज है त्रिभुवन में ।
इसकी भक्ती निर्झरणी में, स्नान करूँ अघ धो लूँ मैं ।।
अद्भुत अनंत निज शांती को, पाकर निज में विश्राम करूँ ।
निज ‘ज्ञानमती’ ज्योती पाकर, अज्ञान तिमिर अवसान करूँ ।।।११ । ।
– दोहा —

नमूँ नमूँ सम्मेदगिरि, करूँ मोह अरि विद्ध । मृत्युंजय पद प्राप्त कर, वरूँ सर्वसुख सिद्धि ।।१२ ।| ★