-राजेश रेड्डी .....
क्या तमाशा है कि थक कर रात को मर जाएंगे
सुब्ह़ फिर हम क़ब्र से उटठेंगे, दफ़्तर जाएंगे
इक सबब तो ये है जीने का कि हम पैदा हुए
दूसरा है ये कि आख़िर एक दिन मर जाएंगे
उस गली में अब हमारा मुन्तिज़र कोई नहीं
दिल की ख़ातिर उस गली से फिर भी होकर जाएंगे