व्यवस्था के चरित्र को उदघाटित करती कविता जिसमें असली गुनाहगार साफ बचकर निकल जाता है और हमेशा मारा जाता है आम जन।
सफलता की कुंजी
- कुंवर नारायण
दोनों के हाथों में भरी पिस्तौलें थीं
दोनों एक-दूसरे से डरे हुए थे
दोनों के दिल एक-दूसरे के लिए
पुरानी नफ़रतों से भरे हुए थे
उस वक़्त वहाँ वे दो ही थे
लेकिन जब गोलियाँ चलीं
मारा गया एक तीसरा जो वहाँ नहीं
चाय की दुकान पर था...
पकड़ा गया एक चौथा
जो चाय की दुकान पर भी नहीं
अपने मकान पर था, उसकी गवाही पर
रगड़ा गया एक पाँचवाँ जिसे किसी छठे ने
फँसवा दिया था - सातवें की शिनाख़्त पर
मुक़द्दमा जिस आठवें पर चला, उसके फलस्वरूप
सज़ा नवें को हुई
और जो दसवाँ बिलकुल साफ़ छूटकर एक ग्यारहवें के सामने गिड़गिड़ाने लगा वह
उसकी मार्फ़त
एक नई सफलता तक पहुँचने की कुँजी को
उँगलियों पर नचाने लगा...