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कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार व उपन्यासकार लिखने वाले चुनिंदा लेखकों में से एक थे मुक्तिबोध. बीसवीं सदी की प्रगतिशील हिंदी कविता और आधुनिक कविता के बीच का सेतु माने जाने वाले प्रख्यात गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में डॉक्टर नामवर सिंह ने कहा था-


'नई कविता में मुक्तिबोध की जगह वही है ,जो छायावाद में निराला की थी. निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपनी युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उनकी सीमा की चुनौती देकर उस सर्जनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन हो सका'.

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नबम्बर, 1917 में म.प्र. के शिवपुरी में हुआ था । आर्थिक संकटों के बावजूद इन्होंने अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच एवं वैज्ञानिक उपन्यासों में विशेष रूचि ली । 11 सितम्बर 1964 में मृत्यु हुई ।

गजानन माधव मुक्ति बोध की रचनाएँ

  1. कविता संग्रह-’’चाँद का मुँह टेढ़ा हैं’’ तार सप्तक ।
  2. समीक्षा- एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक डायरी, भारत इतिहास और संस्कृति, नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र ।
  3. कहानी संग्रह- काठ का सपना, सतह से उठता आदमी ।
  4. निबन्ध- नये निबन्ध, न कविता का आत्म संघर्ष ।
  5. उपन्यास-विपात्र ।

गजानन माधव मुक्तिबोध का छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से बहुत गहरा नाता रहा है. मुक्तिबोध ने राजनंदगांव में रहते हुए अपना गहन साहित्य रचा. 'ब्रह्मराक्षस' और 'अंधेरे में' मुक्तिबोध का सांसारिक संघर्ष निखरकर सामने आया है. वह 1958 से से लेकर मौत तक वह राजनांदगांव दिग्विजय कॉलेज से जुड़े रहे. यहीं पर उनके निवास स्थल को मुक्तिबोध स्मारक के रूप में यादगार बनाकर वहां हिंदी के दो अन्य साहित्यकार पदुमलाल बख्शी और डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को संजोते हुए 2005 में एक संग्रहालय की स्थापना भी की गई.

मुक्तिबोध को अपने जीवन काल में न तो बहुत पहचान मिली और न ही उनका कोई भी कविता संग्रह प्रकाशित हो सका. मौत के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल 'एक साहित्यिक की डायरी' प्रकाशि‍त की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनके मौत के दो महीने बाद प्रकाशि‍त हुआ. ज्ञानपीठ ने ही 'चांद का मुंह टेढ़ा है' प्रकाशि‍त किया था. लेकिन उनकी असमय मृत्‍यु के बाद ही मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के परिदृश्‍य पर छा गए.