चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह
किसान नेता चौधरी छोटूराम का लेख। वे जाट गजट अखबार प्रकाशित करते थे। किसानों को जागृत करने के लिए अनेक कदम उठाए। किसान आंदोलन उनके ऋणी रहेंगे। किसान राजनीति की उन्होंने शुरुआत की थी। हिंदू-मुस्लिम एकता व सांप्रदायिक सदभाव के कार्य किया। भारत-विभाजन के वे खिलाफ थे।
जी चाहता है कि शिमला की ऊंची पहाड़ियों पर रहने वाले सरकारी अफसरों को और लाहौर की ठंडी सड़क और सुंदर पार्कों और बागों में मटर गश्ती व सैर-सपाटा करने वाले शहरी हजरात को किसी तरह यह विश्वास दिलाऊं कि आबादी का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसको नाने-शबीना (एक वक्त की रोटी) भी नहीं मिलती है। जो तुम्हारे लिए विलासिता का सामान जुटाता है, वह स्वयं तंग-दस्त और फाका-मस्त है। बेचारा किसान निढाल है, खस्ताहाल है। इसकी गरीबी की यह हालत है कि इसको सरकारी तकाजों को भी पूरा करना दूभर हो जाता है। मगर इसकी बेकसी का सही ज्ञान बहुत कम लोगों को है। हमारी सरकार ने अभी हाल में जिले के अफसरों से चंद सवालात पूछे थे। इनमें से एक सवाल यह था कि क्या सचमुच किसान के सब साधन जवाब दे चुके हैं? हमारी कैसी नन्ही-मुन्नी भोली सरकार है, जिसको अब तक यह पता नहीं कि किसान के आर्थिक जीवन के सब चश्मे सूख चुके हैं!
मगर पता भी कैसे लगे? कागजी हुकूमत है। कागजी घोड़े दौड़ते हैं। कागज का पेट भर दिया जाता है। बस सरकार की तसल्ली हो जाती है। प्रजा का पेट भरा है या नहीं, कागजी घुड़दौड़ में किसी को ध्यान ही नहीं आता। सरकारी अफसरों को केवल कागजों में दर्ज हुई बातों का ही पता होता है। रियाया पर क्या गुजरती है, प्रजा खुशहाल है या बदहाल है, इसका हाल केवल देहात वालों को ही मालूम है। पटवारी को भी मालूम है, लेकिन यह कहने से डरता है। ज्यों-ज्यों ऊपर जाओ, हालात की सही जानकारी कम होती जाती है। यहां तक कि सरकार के बड़े-बड़े दफ्तरों तक पहुंचते-पहुंचते केवल कागजी इंदराजात और कागजी औसत पर ही निर्भर किया जाता है। सच तो यह है कि बड़े अफसरों को सही हालात मालूम होने बड़े कठिन हैं। जो बड़े-बड़े अफसर हैं, उनको तो पुलिस की रिपोर्टों और प्राइवेट चुगलखोरों की बातें सुनने से फुरसत नहीं मिलती। इनका अधिक समय राजनैतिक स्थिति का अध्ययन करने और उनसे संबंधित रिपोर्ट भेजने में खर्च हो जाता है। इलाकों में दौरा करने, प्रजा से मिलने-जुलने, सही जानकारी देने और अपनी आंख से सब चीजों को देखने का इनको मौका ही नहीं मिलता।