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Description

[00:00] - जैन धर्म में पर्युषण पर्व का महत्व और इसकी परंपरा।[02:51] - 'क्षमा वीरस्य भूषणम्': क्षमा वीरों का आभूषण है और इसका वास्तविक अर्थ।[04:28] - केवल मनुष्यों से ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से भी क्षमा माँगना।[08:12] - कर्ता भाव (Doer-ship) को समाप्त करना: "मैंने नहीं किया, परिस्थितियोंवश हो गया।"[12:43] - प्रकृति के नियम और कर्म फल: दूसरों को जलाने से पहले व्यक्ति खुद जलता है।[18:45] - पर्युषण के 10 दिनों का विवरण: उत्तम क्षमा से लेकर उत्तम ब्रह्मचर्य तक।[24:29] - ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ: ब्रह्म जैसा आचरण (बिना किसी भेदभाव के)।[30:05] - दिखावा और ईर्ष्या का पाप: दूसरों को नीचा दिखाने के लिए किए गए कार्य पाप हैं।[39:07] - मुनि का अर्थ और अहंकार का त्याग: भिक्षा मांगकर अहंकार को नष्ट करना।[45:26] - आदि गुरु शंकराचार्य और विधवा ब्राह्मणी की कथा (आंवले का दान)।[50:47] - निंदक का महत्व: निंदक हमें अपनी कमियाँ दिखाकर आईना प्रदान करता है।[01:00:00] - गुरु की शरण और कर्ता भाव से मुक्ति का अंतिम लक्ष्य।