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Description

भगवान शिव की गंगावतरण तीर्थ में तपस्या से जुड़ी इस पवित्र कथा में हिमालय पुत्री पार्वती, गिरिराज हिमालय और देवाधिदेव महादेव के दिव्य मिलन का अद्भुत वर्णन मिलता है।

जब महादेव ने पार्वती के जन्म का समाचार सुना, तब उन्होंने गंगोत्री के पावन स्थल पर एकांत में कठोर तप करने का निश्चय किया।

इस अध्याय में शिवजी की एकाग्रचित्त साधना, हिमालय द्वारा की गई भक्ति-पूजा, देवताओं की उपस्थितियाँ और गंगा के उद्गम स्थान का महात्म्य स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है। यह कथा न केवल शिव-भक्ति की महानता दर्शाती है, बल्कि पार्वती के भविष्य में होने वाले शुभ विवाह की नींव भी रखती है।

गंगा, तपस्या, हिमालय और शिव की साधना—इन सभी का आध्यात्मिक संगम इस अध्याय को अत्यंत पावन और प्रेरणादायी बनाता है।