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शिव पुराण” के आठवें अध्याय में माता मैना और हिमालय के बीच हुआ दिव्य संवाद दर्शाया गया है, जिसमें माता मैना अपनी पुत्री पार्वती के भविष्य और विवाह को लेकर चिंतित होती हैं।

देवर्षि नारद की बातों को याद करते हुए वे हिमालय से पार्वती के लिए एक सुयोग्य, शुभ लक्षणों वाले वर की खोज करने का आग्रह करती हैं।

हिमालय उन्हें सांत्वना देते हुए बताते हैं कि यदि पार्वती को सच्चा सुख पाना है, तो उन्हें भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या करनी होगी। वे समझाते हैं कि भगवान शंकर सदैव कल्याणकारी हैं, और यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो स्वयं पार्वती का पाणिग्रहण करेंगे।

यह अध्याय भक्ति, तपस्या, मातृत्व, दिव्य भाग्य और शंकर-पार्वती के पवित्र मिलन की भूमिका को अत्यंत सुंदर रूप से प्रकट करता है।

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