रघुवीर सहाय साहब अपनी कविताओं के ज़रिए चाहते थे कि स्त्रियां जगें और खिसका दे तमाम मर्दों के पांव तले की ज़मीन. लेकिन उन्होंने समाज की नब्ज़ पकड़ी थी, वे इस समाज की तमाम बुराइयों से परिचित थे. जीवन में उन्होंने ठाठ भी भोगे और मुफलिसी भी झेली थी. विद्रोह की अपनी जो ज्वाला लोग उनके सामने दिखाते थे, उनके मुड़ते ही वह ज्वाला कैसे हवा हो जाती थी