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Description

Here’s an episode that will keep you waiting for the next one. Tune in This gazal is written by

Rizwan khan sultan alig

अजुर्दा हो चले हैं गुलशन की दास्तां से

मायूस हैं ये गुल भी खुद अपने बागबान से

वो रहजनों का अब तो देता है साथ खुल के

उम्मीद भी ये ही थी बस अपने पासबान से

लब पर लगा के ताला सच को छुपा रहे हो

अब हाल इस चमन का पूछें क्यूं बेजबान से

तूफान ने उजाड़ा या बरक उस पे लपकी

बुलबुल तो कैद में है क्या उस को आशियां से

इस जिंदगी की रौनक अब छिन