महाराज निमि की छठी पीढ़ी में हुए राजा देवरात को देवताओं ने शिवजी का दैवी धनुष धरोहर के तौर पर दिया था। वह धनुष कई पीढ़ियों से मिथिला मे महल में पूरे सत्कार के साथ रखा गया और जनक वंशी राजाओं द्वारा पूजित था।
एक बार राजा जनक सीरध्वज के समय में विदेह राज्य में भीषण अकाल हुआ। अपने पुरोहित शतानन्द जी के सुझाव पर राजा जनक ने अपनी पत्नी सुनैना के साथ मिथिला के खेतों में हल चलाया। एक जगह पर वह हल अटक गया, जमीन खोदने पर वहाँ पर एक सोने के पात्र में एक नवजात कन्या थी। राजा जनक ने उस कन्या को गोद ले लिया और उसे सीता नाम दिया।
जिस धनुष को उठाने के लिए पाँच हजार लोग लगते थे, वह एक बार देवी सीता ने बिना किसी की सहायता के उठा लिया, तो राजा जनक ने निर्णय लिया की वो अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ करेंगे जो इस धनुष में प्रत्यंचा चढ़ा पाएगा।
स्वयंवर में उपस्थित कोई भी राजा या राजकुमार शिवजी के धनुष को उठा भी नहीं पाया। इस प्रकार तिरस्कृत होने पर सभी राजाओं ने मिलकर मिथिला पर आक्रमण कर दिया।
एक वर्ष तक उनसे मिथिला की रक्षा करने के बाद राजा जनक ने देवताओं से सहायता मांगी, उन्होंने अपनी सेना भेजकर राजर्षि जनक की मदद की।
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