तारा वानरों के वैद्यराज सुषेण की पुत्री और वाली की पत्नी थी। तारा एक अत्यंत ही समझदार स्त्री थीं और सदा अपने पति को योग्य सुझाव देती थीं। अपनी मृत्यु के समय वाली ने सुग्रीव से तारा की सुरक्षा करने और सदा उनका सुझाव मानने का परामर्श दिया था।
किष्किन्धा का राज्य पाने के बाद सुग्रीव ने तारा से विवाह कर लिया और अपने राज काज में व्यस्त हो गए। सुग्रीव को देवी सीता की खोज का कोई भी प्रयास ना करते देखकर लक्ष्मण जी को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने सुग्रीव को इस अवहेलना का दंड देने की सोची।
क्रोध से भरे हुए लक्ष्मण जी को देखकर भयभीत सुग्रीव अपनी पत्नी तारा की शरण में गए। तारा ने लक्ष्मण जी से बात कर उनका क्रोध शान्त किया और तुरंत प्रभाव से किष्किन्धा की वानर सेना को सीता माता की खोज के कार्य में लगाने का आश्वासन दिया।
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