Beauty is in the eye of the beholder, हिन्दी में इसका तर्ज़ुमा कहता है कि ख़ूबसूरती देखने वालों की आंखों में होता है, ये बात मोटा-मोटी ठीक भी है. लेकिन देखने वाले की आंखें किस आधार पर ये तय करती हैं कि उसे क्या ख़ूबसूरत लगती है क्या नहीं, इसकी क्या फ़िलॉसफ़ी, क्या पॉलिटिक्स और कल्चर का कितना योगदान है, सुनिए ज्ञान-ध्यान में.
साउंड मिक्स- सचिन द्विवेदी