‘हिंदी के नाटक’ न होने और ‘हिंदी में नाटक’ होने ने हिंदी रंगमंच, हिंदी भाषा और भारतीय रंगमंच पर अलग-अलग तरह से असर डाला है। यह मुद्दा शुरू से चर्चा में है कि हिंदी रगमंच पर अन्य भाषाओं से अनूदित और अन्य विधाओं से रूपांतरित मंचनों के मुकाबले हिंदी के मौलिक नाटक कम क्यों खेले जाते हैं? यह स्थिति सर्वमान्य है, क्योंकि कभी किसी ने इस तथ्य से इनकार तो क्या, इस पर शक तक नहीं किया। बहुतेरे नामचीन ‘हिंदी नाट्योत्सवों में मूल हिंदी का एक भी नाटक नहीं’, ने इसे प्रत्यक्ष प्रमाणित किया। किसी भी देश-काल के क्लासिक नाटकों को चुनौती की तरह मंच पर साधना हर कुशल निर्देशक की सहज कला-पिपासा होती है, लेकिन इसके बहाने सब का सब बाहरी ही खेला जाए, और हिंदी मंच पर हिंदी नाटक ‘नॉट प्लेइंग कैप्टन’ बन जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि हिंदी रंगकर्म को ‘हिंदी का रंगमंच’ क्यों कहा जाए? क्यों न इसे ‘हिंदी में रंगकर्म’ कहा जाए?