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Prof. Subhash Saini
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134. Shaheed Udham Singh by Subhash Chander (जीवनी) शहीद उधमसिंह की आत्मकथा - सुभाष चंद्र
(जीवनी) शहीद उधमसिंह की आत्मकथा - सुभाष चंद्र
2022-06-05
52 min
Subhash Saini Podcast
100. Tumhari Jaat Paant ki Kshay by Rahul Sankrityayan / तुम्हारी जात-पांत की क्षय - राहुल सांकृत्यायन
umhari Jaat Paant ki Kshay by Rahul Sankrityayan / तुम्हारी जात-पांत की क्षय - राहुल सांकृत्यायन
2021-07-19
23 min
Subhash Saini Podcast
97. (कविता) अथ रूपकुमार कथा - भगवत रावत
(कविता) अथ रूपकुमार कथा - भगवत रावत
2021-07-17
12 min
Subhash Saini Podcast
96. (कविता) राजे ने रखवाली की - निराला
राजे ने रखवाली की - निराला
2021-07-17
05 min
Subhash Saini Podcast
95. Bhagat Singh Ka Antim Patra Sathiyon Ke Naam शहीद भगतसिंह का अंतिम पत्र साथियों के नाम
शहीद भगतसिंह का अंतिम पत्र साथियों के नाम Bhagat Singh Ka Antim Patra Sathiyon Ke Naam
2021-07-17
04 min
Subhash Saini Podcast
94. Hamen Goli Se Uda Diya Jaye by Bhagat singh, Rajguru And Sukhdev / हमें गोली से उड़ा दिया जाए - शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव
हमें गोली से उड़ा दिया जाए - शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव Hamen Goli Se Uda Diya Jaye by Bhagat singh, Rajguru And Sukhdev /
2021-07-16
11 min
Subhash Saini Podcast
93. Pita Ke Naam Patar by Bhagat Singh / पिता के नाम पत्र - भगत सिंह
Pita Ke Naam Patar by Bhagat Singh / पिता के नाम पत्र - भगत सिंह
2021-07-15
10 min
Subhash Saini Podcast
92. Vidyarthi Aur Rajniti by Bhagat SIngh / विद्यार्थी औऱ राजनीति - भगत सिंह
Vidyarthi Aur Rajniti by Bhagat SIngh / विद्यार्थी औऱ राजनीति - भगत सिंह
2021-07-13
13 min
Subhash Saini Podcast
91. Dharam Aur Hamara Swatantrta Sangram by Bhagat Singh / धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम - भगत सिंह
धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम - भगत सिंह Dharam Aur Hamara Swatantrta Sangram by Bhagat Singh / Religion and Our Freedom Struggle by Bhagat singh
2021-07-13
19 min
Subhash Saini Podcast
90. Sampradik Dange Aur Unka Ilaaj by Bhagat Singh / सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज - भगत सिंह
सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज - भगत सिंह Sampradik Dange Aur Unka Ilaaj by Bhagat Singh
2021-07-11
17 min
Subhash Saini Podcast
89. Achoot Samasya by Bhagat Singh / अछूत समस्या - भगत सिंह
Achoot Samasya by Bhagat Singh / अछूत समस्या - भगत सिंह
2021-07-10
22 min
Subhash Saini Podcast
88. Asfaq Ulla Khan Ka Desh Wasiyon ke Naam Sandesh/ अशफाक उल्ला खान का देश वासियों के नाम संदेश
अशफाक उल्ला खान का देश वासियों के नाम संदेश Asfaq Ulla Khan Ka Desh Wasiyon ke Naam Sandesh/
2021-07-09
06 min
Subhash Saini Podcast
87. Swarg Mein Vichar Shabha by Bhartendu Harish Chander/ (निबंध) स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन - भारतेंदु हरिश्चंद्र
स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन - भारतेंदु हरिश्चंद्र Swarg Mein Vichar Shabha by Bhartendu Harish Chander/
2021-07-09
15 min
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86. Sarkar Aur Aajadi by Ch. Chotu Ram / ( किसानी नजरिया ) सरकार और आजादी -चौ. छोटूराम
सरकार और आजादी -चौ. छोटूराम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-07-08
15 min
Subhash Saini Podcast
85. Angreji Raj Ke Do Pahloo by Ch. Chotu Ram /( किसानी नजरिया ) अंग्रेजी राज के दो पहलू -चौ. छोटूराम
अंग्रेजी राज के दो पहलू -चौ. छोटूराम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-07-08
16 min
Subhash Saini Podcast
84. Char Chor (लोक कथा) चार चोर
Char Chor (लोक कथा) चार चोर
2021-07-07
05 min
Subhash Saini Podcast
83.Punjab Ke Kisan Ka Bhavishya by Ch. Chotu Ram /( किसानी नजरिया ) पंजाब के किसान का भविष्य - चौ. छोटू राम
पंजाब के किसान का भविष्य - चौ. छोटू राम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-07-07
17 min
Subhash Saini Podcast
82. Pagdandiyon Ka Jamama by Harishankar Parsai/ (व्यंग्य) पगडण्डियों का जमाना - हरिशंकर परसाई
(व्यंग्य) पगडण्डियों का जमाना - हरिशंकर परसाई
2021-07-06
14 min
Subhash Saini Podcast
81. Nakhun Kyon Badhte Hain by Aacharya Hajari Prasad Diwedi / (निबंध) नाखून क्यों बढ़ते हैं - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
नाखून क्यों बढ़ते हैं - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
2021-07-05
19 min
Subhash Saini Podcast
81. Afro-Asia Writer Association - Faiz Ahmad Faiz ( भाषण) अफ्रो एशियाई लेखक संघ में भाषण - फैज अहमद फैज़
Afro-Asia Writer Association - Faiz Ahmad Faiz ( भाषण) अफ्रो एशियाई लेखक संघ में भाषण - फैज़ अहमद फैज़ रूस में 1983 में अफ्रो एशियाई लेखक संघ के रजत जयंती के अवसर पर दिया गया क्रांतिकारी शायर फैज अहमद फैज का भाषण. Speech by Revolutionary Poet Faiz Ahmad Faiz in 1983 on the occasion of Silver jubilee function of Afro-Asiatic Writer Association. In this He discuss international political situation and issues and duties of writers in this senerio.
2021-07-03
25 min
Subhash Saini Podcast
80. Sahitya, Sanskriti Aur ShaShan by Maha Devi Verma ( भाषण) साहित्य, संस्कृति और शासन - महादेवी वर्मा
Sahitya, Sanskriti Aur ShaShan by Maha Devi Verma ( भाषण) साहित्य, संस्कृति और शासन - महादेवी वर्मा The lecture giveb by Great Hindi Writer Maha Devi Verma in Assembly Council of U.P. on Literature, Culture and Government.She Spoke only physical development is not sufficient moral and mental development of society should taken care of by the Govt. These should be part and partial developmental plan.
2021-07-02
17 min
Subhash Saini Podcast
79. Kisan Ka Dukhda by Ch. Chotu Ram/( किसानी नजरिया ) किसान का दुखड़ा - चौ. छोटू राम
किसान का दुखड़ा - चौ. छोटू राम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-07-01
17 min
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78. Sharion Ke Chonchle by Ch. Chotu Ram (किसानी नजरिया ) शहरियों के चोंचले - चौ. छोटूराम
शहरियों के चोंचले - चौ. छोटूराम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-07-01
20 min
Subhash Saini Podcast
77. Poos Ki Raat by Premchand/ (कहानी) पूस की रात - प्रेमचंद
Poos Ki Raat by Premchand/ (कहानी) पूस की रात - प्रेमचंद पूस की रात कहानी में भारतीय किसान के चहुंमुखी शोषण का चित्रण ह। पूंजीवादी व्यवस्था के घोर शोषण से छोटा किसान किस तरह मजदूर में तब्दील होता जाता है इस प्रक्रिया को बेहतरी से उदघाटित करती है। Pus Ki Raat is a short story written by Premchand.This story depicts the all-round exploitation of the Indian farmer. It best exposes the process of how a small farmer is transformed into a laborer by the gross exploitation of the capitalist system.
2021-06-30
18 min
Subhash Saini Podcast
76. Wakti Judai KA Daur/(संस्मरण) वक्ती जुदाई का दौर - कृश्न चंदर
1967 में रूस में फैज़ अहमद फैज़ के साथ मुलाकात पर आधारित। भारत-पाक दोस्ती व भारत-पाक जनता के बीच मौजूद प्रेम व भाईचारे को उभारता हुआ। सत्ताधीश अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए दोनों देशों के बीच नफरत फैलाकर युद्धों में झोंकते रहे हैं, लेकिन जनता ऐसा नहीं चाहती। लेखक को उम्मीद है कि नफरत की यह कृत्रिम दीवार एक दिन ढह जाएगी.
2021-06-29
14 min
Subhash Saini Podcast
75. Kissanon Ke Naam Sandesh/ (किसानी नजरिया ) किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम
किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-27
12 min
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74.Dukhi Jeewan/ (निबंध) दुखी जीवन - प्रेमचंद
दुखी जीवन - प्रेमचंद
2021-06-26
19 min
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73. Sahitya Ka Aadhar (निबंध) साहित्य का आधार - प्रेमचंद
(निबंध) साहित्य का आधार - प्रेमचंद
2021-06-26
14 min
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72. Bachhon Ko Swadheen Banao ( निबंध ) बच्चों को स्वाधीन बनाओ - प्रेमचंद
बच्चों को स्वाधीन बनाओ - प्रेमचंद
2021-06-26
14 min
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71. Kagjee Hakumat ( किसानी नजरिया ) कागजी हुकुमत -चौ. छोटूराम
चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह किसान नेता चौधरी छोटूराम का लेख। वे जाट गजट अखबार प्रकाशित करते थे। किसानों को जागृत करने के लिए अनेक कदम उठाए। किसान आंदोलन उनके ऋणी रहेंगे। किसान राजनीति की उन्होंने शुरुआत की थी। हिंदू-मुस्लिम एकता व सांप्रदायिक सदभाव के कार्य किया। भारत-विभाजन के वे खिलाफ थे। जी चाहता है कि शिमला की ऊंची पहाड़ियों पर रहने वाले सरकारी अफसरों को और लाहौर की ठंडी सड़क और सुंदर पार्कों और बागों में मटर गश्ती व सैर-सपाटा करने वाले शहरी हजरात को किसी तरह यह विश्वास दिलाऊं कि आबादी का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसको नाने-शबीना (एक वक्त की रोटी) भी नहीं मिलती है। जो तुम्हारे लिए विलासिता का सामान जुटाता है, वह स्वयं तंग-दस्त और फाका-मस्त है। बेचारा किसान निढाल है, खस्ताहाल है। इसकी गरीबी की यह हालत है कि इसको सरकारी तकाजों को भी पूरा करना दूभर हो जाता है। मगर इसकी बेकसी का सही ज्ञान बहुत कम लोगों को है। हमारी सरकार ने अभी हाल में जिले के अफसरों से चंद सवालात पूछे थे। इनमें से एक सवाल यह था कि क्या सचमुच किसान के सब साधन जवाब दे चुके हैं? हमारी कैसी नन्ही-मुन्नी भोली सरकार है, जिसको अब तक यह पता नहीं कि किसान के आर्थिक जीवन के सब चश्मे सूख चुके हैं! मगर पता भी कैसे लगे? कागजी हुकूमत है। कागजी घोड़े दौड़ते हैं। कागज का पेट भर दिया जाता है। बस सरकार की तसल्ली हो जाती है। प्रजा का पेट भरा है या नहीं, कागजी घुड़दौड़ में किसी को ध्यान ही नहीं आता। सरकारी अफसरों को केवल कागजों में दर्ज हुई बातों का ही पता होता है। रियाया पर क्या गुजरती है, प्रजा खुशहाल है या बदहाल है, इसका हाल केवल देहात वालों को ही मालूम है। पटवारी को भी मालूम है, लेकिन यह कहने से डरता है। ज्यों-ज्यों ऊपर जाओ, हालात की सही जानकारी कम होती जाती है। यहां तक कि सरकार के बड़े-बड़े दफ्तरों तक पहुंचते-पहुंचते केवल कागजी इंदराजात और कागजी औसत पर ही निर्भर किया जाता है। सच तो यह है कि बड़े अफसरों को सही हालात मालूम होने बड़े कठिन हैं। जो बड़े-बड़े अफसर हैं, उनको तो पुलिस की रिपोर्टों और प्राइवेट चुगलखोरों की बातें सुनने से फुरसत नहीं मिलती। इनका अधिक समय राजनैतिक स्थिति का अध्ययन करने और उनसे संबंधित रिपोर्ट भेजने में खर्च हो जाता है। इलाकों में दौरा करने, प्रजा से मिलने-जुलने, सही जानकारी देने और अपनी आंख से सब चीजों को देखने का इनको मौका ही नहीं मिलता।
2021-06-25
12 min
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70. Swasthya Aur Shiksha (निबंध) स्वास्थ्य और शिक्षा - प्रेमचंद
(निबंध) स्वास्थ्य और शिक्षा - प्रेमचंद
2021-06-24
12 min
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69. Sampradayikta Aur Sanskriti - Premchand/(निबंध) सांप्रदायिकता और संस्कृति - प्रेमचंद
सांप्रदायिकता और संस्कृति - प्रेमचंद
2021-06-24
12 min
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68.Bolna Seekh - Ch. Chotu Ram/( किसानी नजरिया ) बोलना सीख - चौ. छोटू राम
Bolna Seekh - Ch. Chotu Ram/ बोलना सीख - चौ. छोटू राम चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945. 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-24
18 min
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67. ( किसानी नजरिया ) नया उपदेश - चौ. छोटू राम
नया उपदेश - चौ. छोटू राम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-23
12 min
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66. ( किसानी नजरिया ) जिंदगी का मरकज़ -चौ. छोटूराम
जिंदगी का मरकज़ -चौ. छोटूराम किसानों के नाम संदेश -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-22
17 min
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65.( किसानी नजरिया ) भारत में मजहब - चौ. छोटूराम
भारत में मजहब - चौ. छोटूराम चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-22
29 min
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64. ( किसानी नजरिया ) दुश्मन की पहचान - चौ. छोटू राम
दुश्मन की पहचान - चौ. छोटू राम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-21
14 min
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63. ( किसानी नजरिया ) किसान की कराहट -चौ. छोटूराम
किसान की कराहट -चौ. छोटूराम चौधरी छोटूराम स्वतंत्रता से पहले किसान नेता व चिंतक-विचारक थे। किसानों को जागृत करने के लिए उन्होंने जाट-गजट नाम का उर्दू साप्ताहिक प्रकाशित किया। इसमें किसानों में व्याप्त बुराइयों, अंधविश्वास, पांखड, अज्ञानता को दूर करने के लिए तीखे लेख लिखे। किसानों का शोषण करने वाले महाजनों, पंडा-पुजारी वर्ग व शासकों को भी खरी खरी सुनाई। हिंदू-मुस्लिम एकता, धार्मिक सद्भाव व भाईचारे के चैंपियन थे। वे भारत-पाक विभाजन के खिलाफ थे। किसानों को संगठित होने व किसान आंदोलन को तीव्र करने के लिए अनेक कार्य किए. यहां उनके लेखों की शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। ये लेख तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी. satyashadhak foundation यूट्यूब चैनल पर उनके विचारों को सुन सकते हैं। चौधरी छोटूराम का जीवन परिचय जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।
2021-06-21
22 min
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62.Lalkar - Ch. Chotu Ram/ ( किसानी नजरिया ) ललकार - चौ. छोटूराम
Lalkar - Ch. Chotu Ram/ ललकार - चौ. छोटूराम, अनुवाद-हरि सिंह वर्तमान युग तरक्की का युग है, विज्ञान का युग है, ज्ञान और हुनर का युग है, भाषण और लिखाई का युग है, संगठन का युग है! परन्तु बेचारा किसान है कि वर्तमान युग की इन सब विशेषताओं से अनभिज्ञ है। पुरानी कुंड का ठेकरा है और समझता है कि आखिर दुनिया ऐसी भी क्या मानवता से खाली होगी कि इसको एक अपवित्र और व्यर्थ की वस्तु की भांति पांव की ठोकर से ठुकरा दे। क्या भोला बन्दा है! प्रतिदिन देखता है कि जब इन्सान लींबू का रस निकाल चुकता है तो बेरस छिलक को इतनी दूर फैंकता है कि फिर पैर नीचे आकर फिसलने का कारण न बन सके। मेरे प्यारे भाई, आदर के योग्य मेरे प्यारे दहकान भाई, यह तमाशा देखकर भी कोई सबक नहीं सीखा। उफ! मैं भी क्या इन्सान हूं! कैसा सवाल पूछ रहा हूं? किसान की पहचान तो यही है कि देखे और फिर न देखे। इसकी आंख को बारीकी से देखने का अभ्यास नहीं। आंखें से कुआं और जोहड़ तो देख लेता है। बस इसकी देखने की सीमा यहीं तक है। सौ बार ठोकर खाए और फिर भी मार्ग में पड़े पत्थर से सावधान नहीं हो। यही तो किसान की निराली शान है। किसान क्या है? प्राचीन सभ्यता का एक स्मारक है पुरानी संस्कृति का एक बचा हुआ भाग है। समुद्री जहाज आए, रेल आई, तारा आया, बेतार का तार आया, वायुयान आया। विज्ञान के आविष्कारों ने दुनिया छोटी कर दी, अब दूरी का कोई अर्थ नहीं रहा। समुद्र की तह में और आकाश की फिजा में अपने नये यंत्रों की पहुंच का आश्चर्यजनक प्रमाण पेश किया है। परंतु किसान है अपनी पुरानी चाल नहीं बदलता। जमाना बदला, हालात बदले, पड़ौसी बदले। यदि कोई नहीं बदला तो किसान नहीं बदला। वही हल, वही गड्ढा, वही रहट और वही कोल्हू, वही कस्सी और वही खुर्पा। मित्र और शुभचिंतक कहते-कहते थक गए कि भाई हिलो, जमाना हरकत का है। जमाना जुम्बिस (गति) का है। जमाना तरक्की का है, लेकिन जमीन जुम्बद गुल मुहम्मद (जमीन हिल जाए पर मियां गुल मुहम्मद वही रहेगा)। जमींदार शायद समझता है कि न बदलना, न हिलना-जुलना यह भी सदाचार संहिता में शामिल है। जमाना बेशक बदल जाए, लेकिन मेरा बदलना मेरी शान के खिलाफ है। लेकिन जमींदार भाई सुन। यह हठधर्मी छोड़ दे। मैं भी तेरा भाई हूं। तेरी ही बिरादरी का एक छोटा सा सदस्य हूं। तेरा सच्चा शुभचिंतक हूं। तेरे वर्ग का सच्चा हितैषी हूं। तेरी जमायत का सेवक हूं। जाड़े के मौसम में बारीक मलमल के कपड़े पहनना समझदारी नहीं है। यह जमाना बदल गया तो तू भी बदल। अब हालात बदल गए तो भी अपने अंदर तबदीली ला। तीर व तलवार का जमाना गया। अब बंदूक, मशीन गन, बम और विषैली गैसों के शस्त्रों से लड़ाई लड़ी जाती है। अब ढाल तलवार को टांड पर रख दे। अपने-आप को नए शस्त्रों से सुसज्जित कर! यदि ऐसा नहीं करेगा, तो तेरी खैर नहीं। तू शान को मरता है, परन्तु तू यह नहीं देखता कि तेरी हस्ती खतरे में है। तू उच्च आचार का पुजारी बनता है, परन्तु तू यह नहीं देखता कि तेरी हस्ती खतरे में है। तू उच्च आचार का पुजारी बनता है, लेकिन इस बात का पता नहीं कि तेरे ऊंचे आचार-व्यवहार के मजे समाप्त हो गए। तू आईना वफा का दम भरता है, लेकिन तूझे इस बात का पता नहीं कि वर्तमान सभ्यता ने इस चीज को रद्द कर दिया है। तू अपने वर्तमान अंदाज पर लट्टू है।तू अजीब लापरवाही से कहता है: खामोशी गुफ्तगू है, बे जबानी है जबां मेरी (मेरा मौन ही मेरी बातचीत है और न बोलना ही मेरा बोलना है) इकबाल ने इस नज्म में तेरी ही तस्वीर खींची मालूम होती है। इस नज्म के चंद पद बड़े भौडे पैबंद लगाकर पेश करता हूं। शायद ये तुझ पर कुछ प्रभाव डालें। ‘वतन की फिकर कर नादां मुसीबत आने वाली है तिरी बरबादियों के मशविरे हैं आसमानों में जर देख इसको जो कुछ हो रहा है, होने वाला है धरा क्या है भला अहदे कुहन की दास्तानों में यह खामोशी कहां तक? कुव्वते फरियाद पैदा कर ज्मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों में न समझोगे तो मिट जाओगे ओ हिन्दोस्तां वालो तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में’
2021-06-20
11 min
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61 (निबंध) मैं मजदूर हूं - भगवतशरण उपाध्याय
मैं मजदूर हूं - भगवतशरण उपाध्याय
2021-06-20
16 min
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60. ( निबंध ) आचरण की सभ्यता - सरदार पूर्ण सिंह
आचरण की सभ्यता - सरदार पूर्ण सिंह
2021-06-19
29 min
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59. ( निबंध ) समाज और धर्म - संपूर्णानंद
समतामूलक समाज ही सुखी जीवन का आधार है.
2021-06-18
13 min
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58. ( निबंध) मजदूरी और प्रेम (भाग 2) - सरदार पूर्ण सिंह
मजदूरी और प्रेम (भाग 2) - सरदार पूर्ण सिंह
2021-06-17
22 min
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57. ( निबंध )प्रेम और मजदूरी (भाग- 1) - सरदार पूर्ण सिंह
सरदार पूर्ण सिंह का निबंध प्रेम और मजदूरी (भाग-1)
2021-06-17
17 min
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56 - ( निबंध ) भीष्म को क्षमा नहीं किया गया - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
भीष्म को क्षमा नहीं किया गया - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सत्ता के अत्याचारों के खिलाफ जो बोलने का साहस नहीं करते वे बुद्धिजीवी महाभारत के भीष्म की तरह हैं. उस मेधा, ज्ञान और बल का क्या जो वक्त पर निर्णय न ले सके और जनहित में उपयोग न हो.
2021-06-16
17 min
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55. ( समीक्षा ) बाबूू भारतेंदु हरिश्चंद्र- प्रेमचंद
बाबूू भारतेंदु हरिश्चंद्र- प्रेमचंद
2021-06-15
20 min
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54 - ( पत्र ) अपनी नजर में - प्रेमचंद
अपनी नजर में - प्रेमचंद प्रेमचंद के दो पत्र जो उन्होंने इंद्रनाथ मदान को लिखे थे, जिसमें उनके प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। उससे उनके साहित्यिक सरोकारों व रचना प्रक्रिया का पता चलता है।
2021-06-14
15 min
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53 - ( निबंध ) मानसिक पराधीनता - प्रेमचंद
मानसिक पराधीनता म दैहिक पराधीनता से मुक्त होना तो चाहते हैं, पर मानसिक पराधीनता में अपने-आपको स्वेच्छा से जकड़ते जा रहे हैं। किसी राष्ट्र या जाति का सबसे बहुमूल्य अंग क्या है? उसकी भाषा, उसकी सभ्यता, उसके विचार, उसका कल्चर। यही कल्चर हिंदू को हिंदू मुसलमान को मुसलमान और ईसाई को ईसाई बनाए हुए हैं। मुसलमान इसी कल्चर की रक्षा के लिए हिंदुओं से अलग रहना चाहता है, उसे भय है, कि सम्मिश्रण से कहीं उसके कल्चर का रूप ही विकृत न हो जाए। इसी तरह हिंदू भी अपने कल्चर की रक्षा करना चाहता है, लेकिन क्या हिंदू और क्या मुसलमान, दोनों अपने कल्चर की रक्षा की दुहाई देते हुए भी उसी कल्चर का गला घोंटने पर तुले हुए हैं। कल्चर (सभ्यता या परिष्कृति) एक व्यापक शब्द है। हमारे धार्मिक विचार, हमारी सामाजिक रूढ़ियाँ, हमारे राजनैतिक सिद्धांत, हमारी भाषा और साहित्य, हमारा रहन-सहन, हमारे आचार-व्यवहार, सब हमारे कल्चर के अंग हैं, पर आज हम अपनी बेदर्दी से उसी कल्चर की जड़ काट रहे हैं। पश्चिम वालों को शक्तिशाली देखकर हम इस भ्रम में पड़ गए हैं, कि हममें सिर से पाँव तक दोष ही दोष हैं, और उनमें सिर से पाँव तक गुण ही गुण। इस अंधभक्ति में हमें उनके दोष भी गुण मालूम होते हैं और अपने गुण भी दोष। भाषा को ही ले लीजिए। आज अंग्रेजी हमारे सभ्य समाज की व्यावहारिक भाषा बनी हुई है। सरकारी भाषा तो वह है ही, दफ्तरों में भी हमें अंग्रेजी में काम करना ही पड़ता है; पर उस भाषा की सत्ता के हम ऐसे भक्त हो गए हैं, कि निजी चिट्ठियों में, घर की बातचीत में भी उसी भाषा का आश्रय लेते हैं। स्त्री पुरुष को अंग्रेजी में पत्र लिखती है, पिता पुत्र को अंग्रेजी में पत्र लिखता है। दो मित्र मिलते हैं, तो अंग्रेजी में वार्तालाप करते हैं, कोई सभा होती है, तो अंग्रेजी में डायरी अंग्रेजी में लिखी जाती है। फ्रांसीसी कवि फ्रेंच में कविता करता है, जर्मन जर्मन में, रूसी रशियन में, कम-से-कम जिन रचनाओं पर उसे गर्व होता है, वह अपनी ही भाषा में करता है; लेकिन हमारे यहाँ के सारे कवि और सारे लेखक अंग्रेजी में लिखने लगें, अगर केवल कोई प्रकाशक उनकी रचनाओं को छापने पर तैयार हो जाए। जिन्हें प्रकाशक मिल जाते हैं, वह चुकते भी नहीं, चाहे अंग्रेज आलोचक उनका मजाक ही क्यों न उड़ावें, मगर वह खुश हैं। हम मानते हैं, कि अंग्रेजी भाषा पौढ़ है, हरेक प्रकार के भावों को आसानी से जाहिर कर सकती है और भारतीय भाषाओं में अभी यह बात नहीं आई लेकिन जब वही लोग, जिन पर भाषा के निर्माण और विकास का दायित्व है, दूसरी भाषा के उपासक हो जायें, तो उनकी अपनी भाषा का भविष्य भी तो शून्य हो जाता है। फिर क्या विदेशी साहित्य की नींव पर आप भारतीय राष्ट्रीयता की दीवार खड़ी करेंगे? यह हिमाकत है। आज हमारा पठित-समाज साधारण जनता से पृथक हो गया है। उसका रहन-सहन, उसकी बोल-चाल, उसकी वेश-भूषा, सभी उसे साधारण समाज से अलग कर रहे हैं। शायद वह अपने दिल में फूला नहीं समाता, कि हम कितने विशिष्ट हैं। शायद वह जनता को नीच और गंवार समझता है, लेकिन वह खुद जनता की नजरों से गिर गया। है। जनता उससे प्रभावित नहीं होती, उसे ‘किरंटा’ या ‘बिगड़ैल’ या ‘साहब बहादुर कहकर उसका बहिष्कार करती है और आज खुदा न खासता वह किसी अंग्रेज के हाथों पिट रहा हो, तो लोग उसकी दुर्गति का मजा उठावेंगे, कोई उसके पास भी न फटकेगा। जरा इस गुलामी को देखिए, कि हमारे विद्यालयों में हिंदी या उर्दू भी अंग्रेजी द्वारा पढ़ाई जाती है। मगर बेचारा हिंदी प्रोफेसर अंग्रेजी में लेक्चर न दें, तो छात्र उसे नालायक समझते हैं। आदमी के मुख से कलंक लग जाए तो वह शरमाता है, उस क्लक को छिपाता है, कम-से-कम उस पर गर्व नहीं करता; पर हम अपनी दासता के कलंक को दिखाते फिरते हैं, उसकी नुमाइश करते हैं, उस पर अभिमान करते हैं, मानो वह नेकनामी का तमाशा हो, या हमारी कीर्ति की ध्वजा वाह री भारतीय दासता, तेरी बलिहारी है!
2021-06-14
21 min
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52 - ( निबंध ) अदभुत अपूर्व स्वप्न - भारतेंदु हरिश्चंद्र
अदभुत अपूर्व स्वप्न - भारतेंदु हरिश्चंद्र आज रात्रि को पर्यंक पर जाते ही अचानक आँख लग गई। सोते में सोचता क्या हूँ कि इस चलायमान शरीर का कुछ ठीक नहीं। इस संसार में नाम स्थिर रहने की कोई युक्ति निकल आवे तो अच्छा है, क्योंकि यहाँ की रीति देख मुझे पूरा विश्वास होता है कि इस चपल जीवन का क्षण भर का भरोसा नहीं। ऐसा कहा भी है – स्वाँस स्वाँस पर हरि भजो वृथा स्वाँस मति खोय। ना जाने या स्वाँस को आवन होय न होय।। देखो समय-सागर में एक दिन सब संसार अवश्य मस्त हो जायगा। काल-वश शशि-सूर्य भी नष्ट हो जाएँगे। आकाश में तारे भी कुछ काल पीछे दृष्टि न आवेंगे। केवल कीर्ति-कमल संसार-सरवर में रहे वा न रहे, और सब तो एक न एक दिन तप्त तवे की बूँद हुए बैठे हैं। इस हेतु बहुत काल तक सोच-समझ प्रथम यह विचारा कि कोई देवालय बनाकर छोड़ जाऊँ, परंतु थोड़ी ही देर में समझ में आ गया कि इन दिनों की सभ्यता के अनुसार इससे बड़ी कोई मूर्खता नहीं और वह तो मुझे भली भाँति मालूम है कि यह अँगरेजी शिक्षा रही तो मंदिर की ओर मुख फेरकर भी कोई न देखेगा। इस कारण इस विचार का परित्याग करना पड़ा। फिर पडे-पडे पुस्तक रचने की सूझी। परंतु इस विचार में बडे काँटे निकले। क्योंकि बनाने की देर न होगी कि कीट ‘क्रिटिक’ काटकर आधी से अधिक निगल जाएँगे। यश के स्थान, शुद्ध अपयश प्राप्त होगा। जब देखा कि अब टूटे-फूटे विचार से काम न चलेगा, तब लाड़िली नींद को दो रात पड़ोसियों के घर भेज आँख बंद कर शंभु की समाधि लगा गया, यहाँ तक कि इकसठ वा इक्यावन वर्ष उसी ध्यान में बीत गए। अंत में एक मित्र के बल से अति उत्तम बात की पूँछ हाथ में पड़ गई। स्वप्न ही में प्रभात होते ही पाठशाला बनाने का विचार दृढ़ किया। परंतु जब थैली में हाथ डाला, तो केवल ग्यारह गाड़ी ही मुहरें निकलीं। आप जानते हैं इतने में मेरी अपूर्व पाठशाला का एक कोना भी नहीं बन सकता था। निदान अपने इष्ट-मित्रों की भी सहायता लेनी पड़ी। ईश्वर को कोटि धन्यवाद देता हूँ जिसने हमारी ऐसी सुनी। यदि ईंटों के ठौर मुहर चिनवा लेते तब भी तो दस-पाँच रेल रूपये और खर्च पड़ते। होते-होते सब हरि-कृपा से बनकर ठीक हुआ। इसमें जितना समस्त व्यय हुआ वह तो मुझे स्मरण नहीं है, परंतु इतना अपने मुंशी से मैंने सुना था कि एक का अंक और तीन सौ सत्तासी शून्य अकेले पानी में पड़े थे। बनने को तो एक क्षण में सब बन गया था, परंतु उसके काम जोड़ने में पूरे पैंतीस वर्ष लगे। जब हमारी अपूर्व पाठशाला बनकर ठीक हुई, उसी दिन हमने हिमालय की कंदराओं में से खोज-खोजकर अनेक उद्दंड पंडित बुलवाए, जिनकी संख्या पौन दशमलव से अधिक नहीं है। इस पाठशाला में अगणित अध्यापक नियत किए गए परंतु मुख्य केवल ये हैं – पंडित मुग्धमणि शास्त्री तर्कवाचस्पति, प्रथम अध्यापक। पाखंडप्रिय धर्माधिकारी अध्यापक धर्मशास्त्र। प्राणांतकप्रसाद वैद्यराज; अध्यापक वैद्यक-शास्त्र। लुप्तलोचन ज्योतिषाभरण, अध्यापक ज्योतिषशास्त्र। शीलदानानल नीति-दर्पण, अध्यापक आत्मविद्या। इन पूर्वोक्त पंडितों के आ जाने पर अर्धरात्रि गए पाठशाला खोलने बैठे। उस समय सब इष्ट-मित्रों के सन्मुख उस परमेश्वर को कोटि धन्यवाद दिया, जो संसार को बनाकर क्षण-भर में नष्ट कर देता है और जिसने विद्या, शील, बल के सिवाय मान, मूर्खता, परद्रोह, परनिंदा आदि परम गुणों से इस संसार को विभूषित किया है। हम कोटि धन्यवादपूर्वक आज इस सभा के सन्मुख अपने स्वार्थरत चित्त की प्रशंसा करते है जिसके प्रभाव से ऐसे उत्तम विद्यालय की नींव पड़ी। उस ईश्वर को ही अंगीकार था कि हमारा इस पृथ्वी पर कुछ नाम रहे, नहीं तो जब द्रव्य की खोज में समुद्र में डूबते-डूबते बचे थे तब कौन जानता था कि हमारी कपोलकल्पना सत्य हो जायगी। परंतु ईश्वर के अनुग्रह से हमारे सब संकट दूर हुए और अंत समय, हमारी अभिलाषा पूर्ण हुई। इनसे भिन्न पंडित प्राणांतकप्रसाद भी प्रशंसनीय पुरुष हैं। जब तक इस घट में प्राण हैं तब तक न किसी पर इनकी प्रशंसा बन पड़ी न बन पड़ेगी। ये महावैद्य के नाम से इस समस्त संसार में विख्यात हैं। चिकित्सा में ऐसे कुशल हैं कि चिता पर चढ़ते-चढ़ते रोगी इनके उपकार का गुण नहीं भूलता। कितना ही रोग से पीड़ित क्यों न हो क्षण भर में स्वर्ग के सुख को प्राप्त होता है। जब तक औषधि नहीं देते केवल उसी समय तक प्राणों को संसारी व्यथा लगी रहती है।
2021-06-13
19 min
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51 - ( निबंध ) घर जोड़ने की माया - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
घर जोड़ने की माया - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सन् 1942-43 ई. में मैंने कबीरदास के सम्बंध में एक पुस्तक लिखी पुस्तक लिखने की तैयारी दो-ढाई साल से कर रहा था और नाना प्रकार के प्रश्न मेरे मन में उठते रहे। मुझे सबसे अधिक आश्चर्य कबीरदास के परवर्ती साहित्य को पढ़कर हुआ। जिस धर्मवीर ने पीर, पैगंबर, औलिया आदि के भजन-पूजन का निषेध किया था, उसी की पूजा चल पड़ी, जिस महापुरुष ने संस्कृत को कूप जल कहकर भाषा के बहते नीर को बहुमान दिया था, उसी की स्तुति में आगे चलकर संस्कृत भाषा में अनेक स्त्रोत लिखे गए और जिसने बाह्याचारों के जंजाल को भस्म कर डालने के लिए अन तुल्य वाणियाँ कहीं, उसकी उन्हीं वाणियों से नाना बाह्याचारों की क्रियाएँ संपन्न की जाने लगीं। इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है ? कबीरोपासना पद्धति में सोने का, उठने का, दिशा जाने का, तूंबा धोने का, हाथ मटियाने का, मुँह धोने का दातून करने का, जल में पैठने का स्नान करने का तर्पण करने का चरणामृत देने और लेने का, जल पीने का घर बुहारने का चूल्हे में आग जलाने का, परसने का, अँचाने का तथा अन्य अनेक छोटे-छोटे कर्मों का मंत्र दिया गया है। टोपी लगाने का, दीपक बारने का आसन लगाने का कमर कसने का रास्ता चलने का सुमिरन दिया हुआ है। ये मंत्र ‘बीजक’ आदि ग्रंथों की वाणियों से लिए गए हैं आवश्यकतानुसार उनमें थोड़ा बहुत घटा बढ़ा लेने में विशेष संकोच नहीं अनुभव किया गया। वाणियाँ भी ज़रूरत पड़ने पर बना ली गई हैं। मेरे मन में बराबर यह प्रश्न उठता रहा कि ऐसा क्यों हुआ। कबीरपंथ की ही यह हालत हो, ऐसा नहीं है। अनेक महान धर्म तक जाति-पाँति के ढकोसलों, चूल्हा चाकी के निरर्थक विधानों और मंत्र यंत्र के क्लांतिकर टोटकों में पर्यवसित हो गए हैं। विषय में कोई बात तक कहना पसंद नहीं किया, परंतु उनका प्रवर्तित विशाल धर्म-मत मंत्र यंत्र में समाप्त हो गया। यह नहीं जनता में धर्म गुरुओं के प्रति श्रद्धा नहीं है। श्रद्धा का अतिरेक ही तो सर्वत्र पाया जाता है। कबीरदास ने अवतारों और पैगंबन शब्दों में निंदा की। उनके शिष्यों ने श्रद्धा के अतिरेक में उन्हें जिस प्रकार भवफेद को काटनेवाला समझकर स्तुति की वह पैगंबर के लिए ईर्ष्या की वस्तु हो सकती है जब किसी महापुरुष के नाम पर कोई संप्रदाय चल पड़ता है तो आगे चलकर उसके सभी अनुयायी कम बुद्धिमान ही होते हैं, ऐसी बात नहीं। कभी कभी शिष्य परंपरा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल संप्रदाय प्रवर्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी संप्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिंतन कम हो जाता है। संप्रदाय की प्रतिष्ठा ही जब सबसे बड़ा लक्ष्य हो जाता है तो लक्ष्य पर से दृष्टि हट जाती है। प्रत्येक बड़े ‘यथार्थ’ को संप्रदाय के अनुकूल संगति लगाने की चिंता ही बड़ी हो जाती है। इसका परिणाम यह साधन की शुद्धि की परवा नहीं की जाती। परंतु यह भी ऊपरी बात है। साधन की शुद्धि की परवा न करना भी असली कारण नहीं है, वह भी कार्य है , क्योंकि साधन की अशुचिता को सत्य भ्रष्ट होने का कारण मान लेने पर भी यह प्रश्न बना ही रह जाता है कि विद्वान और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी साधन की अशुचिता के शिकार क्यों बन जाते हैं। कोई ऐसा बड़ा कारण होना चाहिए, जो बुद्धिमानों की अक्ल पर आसानी से परदा डाल देता है। जहाँ तक कबीरदास का सम्बंध है, उन्होंने अपनी ओर से इस कारण की ओर इशारा कर दिया था घर जोड़ने की अभिलाषा ही इस मूल कारण है लोग केवल सत्य को पाने के लिए देर तक नहीं टिके रह सकते। उन्हें धन चाहिए, मान चाहिए, यश चाहिए, कीर्ति चाहिए। ये प्रलोभन ‘सत्य’ कही जानेवाली बड़ी वस्तु से अधिक बलवान साबित हुए हैं। कबीरदास ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि जो उनके मार्ग पर चलना चाहता हो, अपना घर पहले फूँक दे मैं ज्यों-ज्यों कबीरपंथी साहित्य का अध्ययन करता गया, त्यों-त्यों यह बात अधिकाधिक स्पष्ट होती गई कि इर्द-गिर्द की सामाजिक व्यवस्था का प्रभाव बड़ा जबर्दस्त साबित हुआ है। उसने सत्य, ज्ञान, भक्ति और वैराग्य को बुरी तरह दबोच लिया है। केवल कबीरपंथ में ही ऐसा नहीं हुआ है। सब बड़े-बड़े मतों की यही अवस्था है। समाज में मान-प्रतिष्ठा का साधन पैसा है। जब चारों ओर पैसे का राज हो तब उसके आकर्षण को काट सकना कठिन है। क्या कोई ऐसा उपाय नहीं हो सकता कि समाज से पैसे का राज खतम हो जाय ? हमारे समस्त बड़े प्रयत्न इस एक चट्टान से टकरा कर चूर हो जाते हैं क्या कोई ऐसी व्यवस्था हो सकती है,
2021-06-12
17 min
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50 - ( निबंध ) परीक्षा - पं. प्रताप नारायण मिश्र
जीवन में परीक्षा हमेशा ही भयभीत करती है। सामाजिक संबंधों की परीक्षा हो तो बहुत कम ही पास होते हैं।
2021-06-12
04 min
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49 - ( निबंध ) प्रेमचंद का महत्व - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
अगर उत्तर भारत को समस्त जनता के आचार-विचार, भाव-भाषा, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो में आपको निःसंशय बता सकता हूँ कि प्रेमचन्द से उत्तम परिचायक आपको दूसरा नहीं मिल सकता । झोपड़ियों से लेकर महलों तक, खोमचेवालों से लेकर बैंकों तक, गाँव पंचायतों से लेकर धारा-सभाओं तक, आपको इतने कौशलपूर्वक और प्रामाणिक भाव से कोई नहीं ले जा सकता । आप बेखटके प्रेमचन्द का हाथ पकड़ कर मेड़ों पर गाते हुए किसान को, अन्तःपुर में मान किये प्रियतमा को, कोठे पर बैठी हुई वारवनिता को, रोटियों के लिए ललकते हुए भिखमंगों को, कूट परामर्श में लीन गोयन्दों को, ईर्षापरायण प्रोफेसरों को, दुर्बलहृदय बैंकरों को, साहस-परायण चमारिन को, ढोंगी पण्डित को, फरेबी पटवारी को, नीचाशय अमीर को देख सकते हैं और निश्चिन्त होकर विश्वास कर सकते हैं कि जो कुछ आपने देखा है। - आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें) प्रेमचंद का महत्व - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
2021-06-11
15 min
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48 - ( निबंध ) इतिहास और पुराण - राहुल सांकृत्यायन
सत्ता पिपासु लोग इतिहास को विकृत करके समुदायों और वर्गों को एक-दूसरे खिलाफ भड़काते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैंं। इतिहास और पुराण का घालमेल समाज में मिथ्या चेतना व अवैज्ञानिकता को बढ़ावा देते हैं। राहुल सांकृत्यायन का यह लेख इसके बारे में हमारी दृष्टि निर्मित करने में मदद करता है। प्रस्तुत है राहुल सांकृत्यायन का लेख - इतिहास और पुराण।
2021-06-11
09 min
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47 - ( निबंध ) साहित्यकारः व्यक्ति और समष्टि - महादेवी वर्मा
साहित्यकारः व्यक्ति और समष्टि - महादेवी वर्मा
2021-06-09
17 min
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46 - ( निबंध ) नई संस्कृति की ओर - रामवृक्ष बेनीपुरी
हिन्दोस्तान आज़ाद हो गया। आज़ाद हिन्दोस्तान का ध्यान एक नए समाज के निर्माण की ओर केन्द्रित हो रहा है। यह नया समाज कैसा हो?- उसका मूल आधार कैसा हो? उसका विकास किस प्रकार किया जाए? हिन्दोस्तान का हर देशभक्त इन प्रश्नों पर सोच-विचार कर रहा है। समाज को अगर एक वृक्ष मान लिया जाए, तो अर्थनीति उसकी जड़ है, राजनीति तना; विज्ञान आदि उसकी डालियाँ हैं और संस्कृति उसके फूल । इसलिए नए समाज की अर्थनीति या राजनीति आदि पर ही हमें ध्यान नहीं देना है बल्कि उसकी संस्कृति की ओर सबसे अधिक ध्यान देना है; क्योंकि मूल और तने की सार्थकता तो उसके फूल में ही है।
2021-06-09
12 min
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45 - ( निबंध ) शिरीष के फूल - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
शिरीष के फूल - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जहाँ बैठकर यह लेख लिख रहा हूँ उसके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, शिरीष के अनेक पेड़ हैं | जेठ की जलती धूप में, जबकि धरित्री निर्धन अग्निकुंड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था | कम फूल इस प्रकार की गरमी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं | कर्णीकार ( कनेर या कनियार ) और आराग्वध ( अमलतास ) की बात मैं भूल नहीं रहा हूँ | वे भी आस-पास बहुत हैं |लेकिन शिरीष के साथ आराग्वध की तुलना नहीं की जा सकती | वह पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है, वसंत ऋतु के पलाश की भाँति | कबीरदास को इस तरह पंद्रह दिन के लिए लहक उठना पसंद नहीं था | यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंखड़-के-खंखड़ – ‘दिन दस फूला फूलि के खंखड़ भया पलास!’ ऐसे दमदारों से तो लँडूरे भले | फूल है शिरीष | वसंत के आगमन के साथ लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है | मन रम गया तो भरे भादो में भी निर्घात फूलता रहता है | जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है |यद्यपि कवियों की भांति हर फूल-पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक ह्रदय विधाता ने नहीं दिया है, पर नितांत ठूँठ भी नहीं हूँ | शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं | शिरीष के वृक्ष बड़े और छायादार होते हैं | पुराने भारत का रईस जिन मंगल-जनक वृक्षों को अपनी वृक्ष-वाटिका की चहारदीवारी के पास लगाया करता था, उनमें एक शिरीष भी है | ( वृहद संहिता 55, 13 ) अशोक, अरिष्ट, पुन्नाग, और शिरीष के छायादार और घनमसृण हरीतिमा से परिवेष्टित वृक्ष-वाटिका जरूर बड़ी मनोहर दिखती होगी | वात्स्यायन ने ‘कामसूत्र’ में बताया है कि वाटिका के सघन छायादार वृक्षों की छाया में ही झूला ( प्रेंखा दोला ) लगाया जाना चाहिए | यद्यपि पुराने कवि बकुल के पेड़ में ऐसी दोलाओं को लगा देखना चाहते थे, पर शिरीष भी क्या बुरा है! डाल इसकी अपेक्षाकृत कमजोर जरूर होती है, पर उसमें झूलनेवालियों का वज़न भी तो बहुत ज्यादा नहीं होता | कवियों की यही तो बुरी आदत है कि वजन का एकदम ख्याल ही नहीं करते | मैं तुंदिल नरपतियों की बात नहीं कह रहा हूँ, वे चाहें तो लोहे का पेड़ बनवा लें | शिरीष का फूल संस्कृत-साहित्य में बहुत कोमल माना गया है | मेरा अनुमान है कि कालिदास ने यह बात शुरू-शुरू में प्रचार की होगी |उनका इस पुष्प पर कुछ पक्षपात था ( मेरा भी है ) | कह गए हैं, शिरीष पुष्प केवल भौरों के पदों का कोमल दबाव सहन कर सकता है, पक्षियों का बिल्कुल नहीं – “पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुन: पतत्रिणाम् |” अब मैं इतने बड़े कवि की बात का विरोध कैसे करूं? सिर्फ विरोध करने की हिम्मत नहीं होती तो भी कुछ कम बुरा नहीं था, यहाँ तो इच्छा भी नहीं है | खैर, मैं दूसरी बात कह रहा था | शिरीष के फूलों की कोमलता देखकर परवर्ती कवियों ने समझा कि उसका सब कुछ कोमल है! यह भूल है| इसके फल इतने मजबूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते | जब तक नए फल-पत्ते मिलकर, धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं | वसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने फल बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं | मुझे इनको देखकर उन नेताओं की बात याद आती है, जो किसी प्रकार ज़माने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मार कर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं | मैं सोचता हूँ कि पुराने कि यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती | जरा और मृत्यु, ये दोनों ही जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य है | तुलसीदास ने अफ़सोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी – ‘धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!’ ( अर्थात जो फलित होता है, वह झड़ता है और जो निर्मित होता है, वह नष्ट होता है ) | मैं शिरीष के फूलों को देख कर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा की झड़ना निश्चित है! सुनता कौन है? महाकालदेवता सपासपा कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं | दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है | मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा जाएँगे | भोले हैं वे | हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो | जमे की मरे! .....
2021-06-08
19 min
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44 - ( पत्र ) अब्राहिम लिंकन का अपने बेटे के शिक्षक नाम पत्र
अब्राहिम लिंकन का अपने बेटे के शिक्षक नाम पत्र सम्माननीय सर मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है। आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए। आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं। मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा। आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा। ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी। आपका अब्राहिम लिंकन
2021-06-06
05 min
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43 - ( निबंध ) अंधविश्वास - प्रेमचंद
अंधविश्वास - प्रेमचंद हिन्दू-समाज में पुजने के लिए केवल लंगोट बांध लेने और देह में राख मल लेने की जरूरत है; अगर गांजा और चरस उड़ाने का अभ्यास भी हो जाए, तो और भी उत्तम। यह स्वांग भर लेने के बाद फिर बाबाजी देवता बन जाते हैं। मूर्ख हैं, धूर्त हैं, नीच हैं, पर इससे कोई प्रयोजन नहीं। वह बाबा हैं। बाबा ने संसार को त्याग दिया, माया पर लात मार दी, और क्या चाहिए? अब वह ज्ञान के भंडार हैं, पहुंचे हुए फकीर, हम उनके पागलपन की बातों में मनमानी बारीकियां ढूंढ़ते हैं, उनको सिद्धयों का आगार समझते हैं। फिर क्या है! बाबा जी के पास मुराद मांगने वालों की भीड़ जमा होने लगती है। सेठ-साहूकार, अमले फैले, बड़े-बड़े घरों की देवियां उनके दर्शनों को आने लगती हैं। कोई यह नहीं सोचता कि एक मूर्ख, दुराचारी, लंपट आदमी क्योंकर लंगोटी लगाने से सिद्ध हो सकता है। सिद्धि क्या इतनी आसान चीज़ है? इसमें मस्तिष्क से काम लेने की मानो शक्ति ही नहीं रही। दिमाग को तकलीफ नहीं देना चाहते हैं। भेड़ों की तरह एक-दूसरे के पीछे दौड़े चले जाते हैं, कुएं में गिरें या खंदक में, इसक गम नहीं। जिस समाज में विचार-मंदता का ऐसा प्रकोप हो, उसको संभालते बहुत दिन लगेंगे।
2021-06-05
11 min
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42 - ( निबंध ) सच्ची वीरता - सरदार पूर्ण सिंह
सच्ची वीरता - सरदार पूर्ण सिंह सरदार पूर्ण सिंह जी (1881 से 1931) का जन्म वर्तमान पाकिस्तान के ज़िला एबटाबाद के गांव सिलहड़ में हुआ था । हाईस्कूल रावलपिंडी से उत्तीर्ण की और एक छात्रवृत्ति पाकर उच्च अध्ययन के लिए जापान चले गए । लौटकर पहले वे साधु जीवन जीने लगे और बाद में गृहस्थ हुए । देहरादून में नौकरी की, कुछ समय ग्वालियर में व्यतीत किया और फिर पंजाब में खेती करने लगे । उन्होंने ‘कन्यादान’, ‘पवित्रता’, ‘आचरण की सभ्यता’, ‘मज़दूरी और प्रेम’, ‘सच्ची वीरता’ आदि कुल छः निबंध लिखे और हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया । उनके सभी निबंध ‘सरदार पूर्ण सिंह के निबंध’ नामक पुस्तक में संकलित है । सच्चे वीर पुरुष धीर, गम्भीर और आज़ाद होते हैं । उनके मन की गम्भीरता और शांति समुद्र की तरह विशाल और गहरी या आकाश की तरह स्थिर और अचल होती है । वे कभी चंचल नहीं होते । रामायण में वाल्मीकि जी ने कुंभकर्ण की गाढ़ी नींद में वीरता का एक चिह्न दिखलाया है । सच है, सच्चे वीरों की नींद आसानी से नहीं खुलती । वे सत्वगुण के क्षीर समुद्र में ऐसे डूबे रहते हैं कि उनको दुनिया की खबर ही नहीं होती । वे संसार के सच्चे परोपकारी होते हैं । ऐसे लोग दुनिया के तख्ते को अपनी आंख की पलकों से हलचल में डाल देते हैं । जब ये शेर जागकर गर्जते हैं, तब सदियों तक इनकी आवाज़ की गूँज सुनाई देती रहती हैऔर सब आवाज़ें बंद हो जाती है । वीर की चाल की आहट कानों में आती रहती हैऔर कभी मुझे और कभी तुझे मद्मत करती है । कभी किसी की और कभी किसी की प्राण-सारंगी वीर के हाथ से बजने लगती है । देखो, हरा की कंदरा में एक अनाथ, दुनिया से छिपकर, एक अजीब नींद सोता है । जैसे गली में पड़े हुए पत्थर की ओर कोई ध्यान नहीं देता में, वैसे ही आम आदमियों की तरह इस अनाथ को कोई न जानता था । एक उदारह्रदया धन-सम्पन्ना स्त्री की की वह नौकरी करता है । उसकी सांसारिक प्रतीष्ठा एक मामूली ग़ुलाम की सी है । पर कोई ऐसा दैवीकरण हुआ जिससे संसार में अज्ञात उस ग़ुलाम की बारी आई । उसकी निद्रा खुली । संसार पर मानों हज़ारों बिजलियां गिरी । अरब के रेगिस्तान में बारूद की सी आग भड़क उठी । उसी वीर की आंखों की ज्वाला इंद्रप्रस्थ से लेकर स्पेन तक प्रज्जवलित हुई । उस अज्ञात और गुप्त हरा की कंदरा में सोने वाले ने एक आवाज़ दी । सारी पृथ्वी भय से कांपने लगी । हां, जब पैगम्बर मुहम्मद ने “अल्लाहो अकबर” का गीत गाया तब कुल संसार चुप हो गया और कुछ देर बाद, प्रकृति उसकी आवाज़ को सब दिशाओं में ले उड़ी । पक्षी अल्लाह गाने लगे और मुहम्मद के पैग़ाम को इधर उधर ले उड़े । पर्वत उसकी वाणी को सुनकर पिघल पड़े और नदियाँ “अल्लाह अल्लाह” का आलाप करती हुई पर्वतों से निकल पड़ी । जो लोग उसके सामने आए वे उसके दास बन गए । चंद्र और सूर्य ने बारी बारी से उठकर सलाम किया । उस वीर का बल देखिए कि सदियों के बाद भी संसार के लोगों का बहुत सा हिस्सा उसके पवित्र नाम पर जीता है और अपने छोटे से जीवन को अति तुच्छ समझकर उस अनदेखे और अज्ञात पुरुष के, केवल सुने-सुनाए नाम पर कुर्बान हो जाना अपने जीवन का सबसे उत्तम फल समझता है ।
2021-06-05
11 min
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41 - ( निबंध ) अध्ययन - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
अध्ययन - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
2021-06-04
13 min
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40 - ( निबंध ) यथास्मै रोचते विश्वम् - रामविलास शर्मा
यथास्मै रोचते विश्वम् - रामविलास शर्मा साहित्य का पांचजन्य समर भूमि में उदासीनता का राग नहीं सुनाता। वह मनुष्य को भाग्य के आसरे बैठने और पिंजड़े में पंख फड़फड़ाने की प्रेरणा नहीं देता। इस तरह की प्रेरणा देने वालों के वह पंख कतर देता है। वह कायरों और पराभव प्रेमियों को ललकारता हुआ एक बार उन्हें भी समरभूमि में उतरने के लिए बुलावा देता है। कहा भी है- “क्लीवानां धाष्ट्र्यजननमुत्साहः शूरमानिनाम्।” भरत मुनि से लेकर भारतेंदु तक चली आती हुई हमारे साहित्य की यह गौरवशाली परंपरा है। इसके सामने निरुद्देश्य कला, विकृति काम-वासनाएँ, अहंकार और व्यक्तिवाद, निराशा और पराजय के ‘सिद्धांत’ वैसे ही नहीं ठहरते जैसे सूर्य के सामने अंधकार.
2021-06-03
13 min
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39 - (लघु कथा) अरब और उसका कुत्ता - मौलाना जलालुद्दीन रुमी
अरब और उसका कुत्ता - मौलाना जलालुद्दीन रुमी एक अरब ने एक कुत्ता पाल रखा था। वह उससे बहुत प्यार करता था। वह उसे हमेशा पुचकारता और दुलारता रहता था लेकिन खाने के लिए कुछ नहीं देता था। एक दिन वह कुत्ता भूखों मर गया। अरब ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसने इतना शोर मचाया कि पास-पड़ोसी तंग आ गए। सब उसके पास आए और उन्होंने पूछा, “इतना क्यों रोते हो ? क्या हुआ?" अरब ने बताया कि उसका कुत्ता मर गया है। वह उसके शोक में रो रहा है। 'कैसे मरा ? मौत की वज़ह क्या थी ?" लोगों ने दरियाफ़्त किया। अरब ने उन्हें बताया कि उसका कुत्ता भूख से मर गया। "उसे तुमने खाना क्यों नहीं दिया? तुम्हारे पास भोजन-सामग्री की कोई 44 कमी तो नहीं दीखती", लोगों ने अरब की पीठ पर लगी खाने की पोटली की ओर इशारा करते हुए पूछा। 'यह तो मेरा खाना है," अरब बोला, "यूं भी मेरा उसूल है कि मैं किसी को कोई चीज़ बगैर उसकी सही क़ीमत लिए नहीं देता। इसी कारण मैंने कुत्ते को खाना नहीं दिया।" "तो फिर ज़ार-ज़ार रोते क्यों हो ?" लोग बोले। 'आंसुओं की कोई कीमत नहीं होती है इसलिए उन्हें मैं अपने कुत्ते की याद ' में बहा रहा हूं, " अरब अरब ने उत्तर दिया। रूमी कहते हैं कि उस अरब का कुत्ते के प्रति प्रेम मात्र एक छलावा और धोखा था, प्रेम नहीं। उसकी तरह बहुत से लोग भी ईश्वर-भक्ति एवं प्रेम का ढोंग रचते हैं। जब तक अपने प्रियतम के लिए भक्त अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तत्पर न हो, उसके हृदय में प्रेम नहीं उपज सकता
2021-06-02
02 min
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38 - (लघु कथा) तेली का तोता - रुमी
तेली का तोता - रुमी एक तेली ने एक तोता पाल रखा था। तोता बड़ा बुद्धिमान था। वह तरह तरह की बोलियां बोलता था। उससे बात कर तेली बहुत ख़ुश हुआ करता था। तेली की ग़ैरेहाज़िरी में तोता ही उसकी दुकान की देख-भाल किया करता था। एक दिन जब तोता दुकान में अकेला था, एक बिल्ली अंदर घुस गई। बिल्ली तोते के ऊपर झपटी। तोता प्राण बचाने के लिए इधर-उधर उड़ने लगा। उड़कर • उसने अपनी जान तो बचा ली लेकिन इस कूद-फांद की वजह से तेल का एक पीपा लुढ़क गया। सारा तेल बह गया। जब तेली वापस लौटा तो दूकान की दशा देखकर वह बड़ा नाराज़ हुआ। उसे लगा कि तोते ने ही पीपा गिराया है। उसने गुस्से में आव देखा न ताव और तोते के सिर पर एक धील जड़ दिया। इस चोट के कारण तोता बोलने की ताकत खो बैठा। साथ ही उसके सारे पंख भी झड़ गए। एक दिन एक गंजा आदमी तेली की दुकान के सामने से गुजरा। उसे देखते ही सहसा तोता चीख पड़ा, “भाई, तुमने किस के तेल का पीपा गिराया था?" गंजा हंसा। वह समझ गया कि बुढ़ापे के कारण हुए उसके गंजेपन को तोता अपने परों के झड़ने की घटना से जोड़ रहा है। इस कथा में दो संदेश छिपे हुए हैं। पहला संदेश यह है कि गुस्से में बिना सोचे-समझे कोई काम नहीं करना चाहिए। तेली की नासमझी एक सुंदर पक्षी को गूंगा और बदसूरत बना दिया था। दूसरा यह कि सामान्यतः आदमी अपने अनुभवों के आधार पर ही दूसरे की स्थिति को परखता है। यथार्थ अलग हो सकता है। बाहरी तौर पर दिखाई पड़ने वाली बात हमेशा सच हो, यह जरूरी नहीं।
2021-06-02
02 min
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37 - ( निबंध ) जापान में क्या देखा - भदन्त आनन्द कौशल्यायन
जापान में क्या देखा - भदन्त आनन्द कौशल्यायन https://desharyana.in/archives/17661 किसी भी व्यक्ति के परिचय के लिए उसके साथ दीर्घकालीन सहवास आब श्यक है और किसी भी देश के परिचय के लिए वहाँ दीर्घकालीन निवास जापान में अपना न दीर्घकालीन निवास ही रहा और न कुछ कहने-सुनने लायक सामाजिक जीवन ही। तो भी दो-चार बातें सुनिए ।
2021-06-01
14 min
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36 - (लघु कथा) चीनी और यूनानी कलाकार - रूमी
चीनी और यूनानी कलाकार - रूमी एक सुल्तान के दरबार में चीन और यूनान, दोनों देशों के कलाकार थे। दोनों वर्ग अपने को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार मानते थे। इस मुद्दे पर इन दोनों तबक़ो में हमेशा बहस होती रहती थी। इस झगड़े के निपटारे के लिए सुल्तान ने एक तजवीज की। सुल्तान ने दोनों वर्गों को एक-एक मकान आबंटित कर दिया। दोनों मकान आमने-सामने थे। उन्हें इन मकानों को अपनी चित्रकारी द्वारा सजाना था। उनकी कलाकारी का निरीक्षण कर सुल्तान यह निर्णय करने वाला था कि किस वर्ग को श्रेष्ठतर माना जाएगा। दोनों वर्ग इस काम में जी-जान से जुट गए। चीनी चित्रकारों ने तरह तरह के रंग इकट्ठे किए और अपने मकान की दीवारों को रंग-बिरंगे अद्भुत चित्रों से ढंक दिया। उनके चित्रों की सुंदरता देखते ही बनती थी। यूनानियों ने न तो कोई रंग जुटाया और न ही उन्होंने अपने मकान की दीवारों पर कोई तस्वीर बनाई। उन्होंने मकान के दीवारों पर जमी काई को साफ कर उन्हें ऐसा चमकाया कि वे शीशे की तरह चमकने लगीं। सुल्तान अपने दरबारियों के साथ मुआयने के लिए पहुंचा। चीनियों की कलाकारी देख सभी दरबारी तारीफ़ करने लगे लेकिन सुल्तान ने यूनानियों को ही इनाम का हक़दार ठहराया। उनके मकान की दीवार पर चीनी चित्रकारों की कलाकृतियां प्रतिबिंबित हो रही थीं। निर्मल-चमकीली दीवारें अब और भी अधिक निखरी लग रही थीं। यूनानियों का मकान चित्त की शुद्धता और निर्मलता का प्रतीक है जबकि चीनियों का मकान अर्जित ज्ञान एवं कौशल का रूमी के अनुसार ज्ञान की तुलना में चित्त की निर्मलता श्रेष्ठतर है क्योंकि एक निर्मल चित्त ही ईश्वरीय सौंदर्य को अपने में समाहित कर सकता है।
2021-06-01
02 min
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35 - ( निबंध ) बौद्धकालीन भारतीय विश्वविद्यालय - आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
बौद्धकालीन भारतीय विश्वविद्यालय - आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
2021-05-30
15 min
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34 - ( निबंध ) उपभोक्तावाद की संस्कृति - श्यामाचरण दुबे
उपभोक्तावाद की संस्कृति और विज्ञापन की चमक-दमक हमें वास्तविकता से दूर ले जा रही है। दिखावा और प्रदर्शन जीवन का पर्याय बनते जा रहे हैं। इस संस्कृति के दुष्परिणामों की ओर संकेत करता निबंध।
2021-05-30
08 min
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33 - ( निबंध ) गेहूं बनाम गुलाब - रामवृक्ष बेनीपुरी
रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसंबर, 1899 को बेनीपुर, मुजफ्फरपुर (बिहार) में हुआ था। वे स्वाधीनता सेनानी के रूप में लगभग नौ साल जेल में रहे। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक बेनीपुरी जी 1957 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से विधायक चुने गए थे। ‘गेहूँ और गुलाब’ 1948 से 1950 के बीच लिखे शब्दचित्रों का संग्रह है, जिसमें 25 शब्दचित्र हैं। इस संग्रह में गेहूं और गुलाब’ शीर्षक एक शब्द चित्र भी है. इनमें समाज, परिवार, व्यक्ति, संस्कृति, प्रकृति, किसान, मजदूर, समाज के वंचित वर्गों- डोम, कंजर, घासवाली, पनिहारिन इत्यादि के चित्र हैं। लेखक ने स्वयं घोषणा की है कि ‘‘यह पुस्तक है और आंदोलन भी।’’ बेनीपुरी जी का निधन 7 सितंबर, 1968 को हुआ । गेहूं और गुलाब गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्या चाहते हैं – पुष्ट शरीर या तृप्त मानस? या पुष्ट शरीर पर तृप्त मानस? जब मानव पृथ्वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्या खाए, क्या पिए? माँ के स्तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी – कुछ न छुट पाए उससे ! गेहूँ – उसकी भूख का काफला आज गेहूँ पर टूट पड़ा है? गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ ! मैदान जोते जा रहे हैं, बाग उजाड़े जा रहे हैं – गेहूँ के लिए। बेचारा गुलाब – भरी जवानी में सिसकियाँ ले रहा है। शरीर की आवश्यकता ने मानसिक वृत्तियों को कहीं कोने में डाल रक्खा है, दबा रक्खा है। किंतु, चाहे कच्चा चरे या पकाकर खाए – गेहूँ तक पशु और मानव में क्या अंतर? मानव को मानव बनाया गुलाब ने! मानव मानव तब बना जब उसने शरीर की आवश्यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी। यही नहीं, जब उसकी भूख खाँव-खाँव कर रही थी तब भी उसकी आँखें गुलाब पर टँगी थीं। उसका प्रथम संगीत निकला, जब उसकी कामिनियाँ गेहूँ को ऊखल और चक्की में पीस-कूट रही थीं। पशुओं को मारकर, खाकर ही वह तृप्त नहीं हुआ, उनकी खाल का बनाया ढोल और उनकी सींग की बनाई तुरही। मछली मारने के लिए जब वह अपनी नाव में पतवार का पंख लगाकर जल पर उड़ा जा रहा था, तब उसके छप-छप में उसने ताल पाया, तराने छोड़े ! बाँस से उसने लाठी ही नहीं बनाई, वंशी भी बनाई।
2021-05-29
16 min
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32 - ( कविता ) महासच - कुंवर नारायण
कुंवर नारायण की कविता ध्यान खींचती है कि सत्ता अपने मीडिया के संसाधनों का प्रयोग करके सच को छुपाता है. किस तरह बड़े बड़े आख्यानों के नीचे छोटे छोटे सच ओझल कर दिए जाते हैं।
2021-05-28
03 min
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31 - ( निबंध ) निंदा रस - हरिशंकर परसाई
क' कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे तूफान की तरह कमरे में घुसे, साइक्लोन जैसा मुझे भुजाओं में जकड़ लिया। मुझे धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद गई। जब धृतराष्ट्र की पकड़ में भीम का पुतला गया तो उन्होंने प्राणघाती स्नेह से उसे जकड़कर चूर कर डाला। ‘क' से क्या मैं गले मिला? हरगिज नहीं। मैंने शरीर से मन को चुपचाप खिसका दिया। पुतला उसकी भुजाओं में सौंप दिया। मुझे मालूम था कि मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हूं। पिछली रात को एक मित्र ने बताया कि ‘क' अपनी ससुराल आया है और ‘ग' के साथ बैठकर शाम को दो-तीन घंटे तुम्हारी निंदा करता रहा। छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए। पर वह मेरा दोस्त अभिनय में पूरा है। उसके आंसू-भर नहीं आए, बाकी मिलन के हर्षोल्लास के सब चिह्न प्रकट हो गए। वह गहरी आत्मीयता की जकड़, नयनों से छलकता वह असीम स्नेह और वह स्नेहसिक्त वाणी। बोला, ‘अभी सुबह गाड़ी से उतरा और एकदम तुमसे मिलने चला आया, जैसे आत्मा का एक खंड दूसरे खंड से मिलने को आतुर रहता है।' आते ही झूठ बोला। कल का आया है, यह मुझे मेरा मित्र बता गया था। कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं, वे आदतन, प्रकृति के वशीभूत झूठ बोलते हैं। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रायोजन झूठ ही निकलता है। मेरे एक रिश्तेदार ऐसे हैं। वे अगर बंबई जा रहे हैं और उनसे पूछें, तो वे कहेंगे, ‘कलकत्ता जा रहा हूं।' ठीक बात उनके मुंह से निकल नहीं सकती। वह बैठा और ‘ग' की निंदा आरंभ कर दी। मनुष्य के लिए जो भी कर्म जघन्य है, वे सब ‘ग' पर आरोपित करके उसने ऐसे गाढ़े काले तारकोल से उसकी तस्वीर खींची कि मैं यह सोचकर कांप उठा कि ऐसी ही काली तस्वीर मेरी ‘ग' के सामने इसने कल शाम को खींची होगी। सुबह से बातचीत के एजेंडा में ‘ग' प्रमुख विषय था। अद्भुत है मेरा मित्र। उसके पास दोषों का ‘कैटलॉग' है। मैंने सोचा कि जब यह हर परिचित की निंदा कर रहा है, तो क्यों मैं लगे हाथ अपने विरोधियों की गत इसके हाथों करा लूं। मैं विरोधियों के नाम लेता गया और वह निंदा की तलवार से काटता चला गया। जैसे लकड़ी चीरने की आरा मशीन के नीचे मजदूर लकड़ी काटता है, वैसे ही। मेरे मन में गत रात्रि उस निंदक मित्र के प्रति मैल नहीं रहा। दोनों एक हो गए। तीन चार घंटे बाद जब वह विदा हुआ तो मन में शांति और तुष्टि थी। निंदा की ऐसी ही महिमा है। निंदकों की सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता भक्तों में दुर्लभ है। इसलिए संतों ने निंदकों को ‘आंगन कुटी छवाय' पास रखने की सलाह दी है। निंदा कुछ लोगों के लिए टॉनिक होती है। हमारी एक पड़ोसन वृद्धा बीमार थी। उठा नहीं जाता था। सहसा किसी ने आकर कहा कि पड़ोसी डॉक्टर साहब की लड़की किसी के साथ भाग गई। बस चाची उठी और दो-चार पड़ोसियों को यह बात अपने व्यक्तिगत ‘कमेंट' के साथ सुना आई। उस दिन से उनकी हालत सुधरने लगी। ..... निंदा कुछ लोगों की पूंजी होती है। बड़ा लंबा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे इस पूंजी से। कई लोगों की ‘रिस्पेक्टेबिलिटी' (प्रतिष्ठा) ही दूसरों की कलंक-कथाओं के पारायण पर आधारित होती है। आप इनके पास बैठिए और सुन लीजिए, ‘बड़ा खराब जमाना गया। तुमने सुना? फलां...और अमुक...।' अपने चरित्र पर आंख डालकर देखने की इन्हें फुरसत नहीं होती। चेख़व की एक कहानी याद रही है। एक स्त्री किसी सहेली के पति की निंदा अपने पति से कर रही है। वह बड़ा उचक्का दगाबाज आदमी है। बेईमानी से पैसा कमाता है। कहती है कि मैं उस सहेली की जगह होती तो ऐसे पति को त्याग देती। तब उसका पति उसके सामने यह रहस्य खोलता है कि वह स्वयं बेईमानी से इतना पैसा लाता है। सुनकर स्त्री स्तब्ध रह जाती है। क्या उसने पति को त्याग दिया? जी हां, वह दूसरे कमरे में चली गई। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम में जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे अहम् को धक्का लगता है, हम में हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निंदा करके उससे अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं। उस मित्र की मुलाकात के करीब दस-बारह घंटे बाद यह सब मन में रहा है। अब कुछ तटस्थ हो गया हूं। सुबह जब उसके साथ बैठा था तब मैं स्वयं निंदा के ‘काला सागर' में डूबता-उतरता था, कलोल कर रहा था। बड़ा रस है निंदा में। सूरदास ने इसे ‘निंदा सबद रसाल'कहा है।
2021-05-27
11 min
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30 - (लघु कथा) सच्चा राजा
सच्चा राजा लघुकथा एक व्यंग्य है अहंकार पर। धन, रूप और बल की प्राप्ति नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं पर जीत हासिल करने वाला ही सच्चा राजा होता है।
2021-05-27
02 min
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29 - (पत्र) सावित्रीबाई फुले का जोतीबा फुले को तीसरा पत्र
सावित्रीबाई फुले का जोतीबा फुले को तीसरा पत्र 20 अप्रैल, 1877 ओटुर, जुननर सच्चाई के अवतार, मेरे स्वामीज्योतिबा, सावित्री आपको प्रणाम करती है! वर्ष 1876 चला गया है, लेकिन अकाल नहीं है – यह सबसे अधिक भयानक रूपों में रहता है. लोग मर रहे हैं, जानवर भी मरकर ज़मीन पर गिर रहे हैं. भोजन की गंभीर कमी है जानवरों के लिए कोई चारा नहीं. लोग अपने गांवों को छोड़ने के लिए मजबूर हैं. कुछ लोग अपने बच्चों, उनकी युवा लड़कियों को बेच रहे हैं और गांवों को छोड़ रहे हैं. नदियां, नाले और जलाशय पूरी तरह से सूख गए हैं – पीने के लिए पानी नहीं. पेड़ मर रहे हैं – पेड़ों पर कोई पत्तियां नहीं. बंजर भूमि हर जगह फटी है सूरज कर्कश है मनो फफोले पड़ जायेंगे, भोजन और पानी के लिए रोते हुए लोग मरकर जमीन पर गिर रहे हैं. कुछ लोग जहरीला फल खा रहे हैं, और अपनी प्यास बुझाने के लिए अपने मूत्र को पी रहे हैं. वे भोजन और पीने के लिए रोते हैं, और फिर मर जाते हैं. हमारे सत्यशोधक स्वयंसेवकों ने लोगों को जरूरत के मुताबिक भोजन और अन्य जान बचाने की सामग्री देने के लिए समितियों का गठन किया है. उन्होंने राहत दस्तों का भी गठन किया है. भाई कोंडज और उनकी पत्नी उमाबाई मेरी अच्छी देखभाल कर रहे हैं ओटुर शास्त्री, गणपति सखारन, डूंबेर पाटिल, और अन्य आपसे मिलने की योजना बना रहे हैं. यह बेहतर होगा यदि आप सातारा से ओतूर आते और फिर अहमदनगर जाते. आपको आर. बी. कृष्णजी पंत और लक्ष्मण शास्त्री को याद होंगे. उन्होंने प्रभावित क्षेत्र में मेरे साथ कूच की और पीड़ितों को कुछ मौद्रिक सहायता प्रदान की. साहूकार स्थिति का शोषण कर रहे हैं. इस अकाल के परिणामस्वरूप कुछ बुरी बातें हो रही हैं दंगे शुरू हो रहे हैं. कलेक्टर ने इस बारे में सुना और स्थिति पर काबू करने के लिए आए. उन्होंने अंग्रेज़ पुलिस अधिकारियों को तैनात किया, और स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश की. पचास सत्यशोधकों को पकड़ा गया है. कलेक्टर ने मुझे बात करने के लिए आमंत्रित किया. मैंने कलेक्टर से पूछा कि अच्छे स्वयंसेवकों को झूठे आरोपों के साथ क्यों पकड़ा गया है और बिना किसी कारण के गिरफ्तार किया गया है. मैंने उनसे तुरंत उन्हें रिहा करने के लिए कहा. कलेक्टर काफी सभ्य और निष्पक्ष थे. वे अंग्रेज़ सैनिकों पर नाराज़ हुए और कहा, “क्या पाटिल किसानों ने लूटमार की? उन्हें फ़ौरन आज़ाद करो” कलेक्टर लोगों की की तकलीफ से आहत थे. उन्होंने तुरन्त चार बैल का गाड़ियों पर खाना (जोवार) भिजवाया. आपने गरीबों और जरूरतमंदों के लिए उदार और कल्याणकारी कार्य शुरू किया है, मैं भी जिम्मेदारी से काम करना चाहती हूँ. मैं आपको आश्वासन देती हूँ कि मैं हमेशा आपकी मदद करती रहना चाहती हूँ इस ईश्वरीय कार्य में जो अधिक से अधिक लोगों की सहायता करे. मैं और अधिक लिखना नहीं चाहती, आपकी अपनी, सावित्री
2021-05-26
07 min
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28 - (पत्र) सावित्रीबाई फुले का जोतीबा फुले को दूसरा पत्र
29 अगस्त 1868 नायगांव, पेटा खंडाला सतारा सच्चाई के अवतार, मेरे स्वामी ज्योतिबा, सावित्री का प्रणाम! मुझे आपका पत्र मिला. हम सब यहां सकुशल हैं, मैं अगले महीने के पांचवें दिन तक आऊंगी. इस विषय पर चिंता मत करिये. इस बीच, यहां एक अजीब बात हुई है. किस्सा इस तरह है कि गणेश नाम का एक ब्राह्मण, गांवों में घूमकर धार्मिक संस्कार करता है और लोगों को उनकी किस्मत बताता है. यह उसकी रोज़ी रोटी है. गणेश और शारजा नाम की एक किशोर लड़की, जो महार (अछूत) समुदाय से है, एक दूसरे से प्रेम करने लगे. वह छह महीने की गर्भवती थी जब लोगों को इस प्रकरण के बारे में पता चला. क्रोधित लोगों ने उन्हें पकड़ा, और उन्हें गांव के बीच से घुमाते हुए और मारने की धमकियां देते हुए ले गए. मुझे उनकी जानलेवा योजना के बारे में पता चला तो मैं मौके पर पहुँची और उन्हें डराकर दूर हटा दिया, और ब्रिटिश कानून के तहत प्रेमियों को मारने के गंभीर परिणामों को इंगित भी किया. उन्होंने मेरी बात सुनने के बाद अपना मन बदल दिया. सदुभाऊ ने गुस्से में कहा कि कृपालु ब्राह्मण लड़के और अछूत लड़की को गांव से बाहर चला जाना चाहिए. दोनों इस पर सहमत थे. मेरा हस्तक्षेप ने उस युगल जोड़े को बचाया, जो मेरे पैरों पर कृतज्ञता से गिर पड़े और रोने लगे. किसी तरह मैंने उन्हें शान्त किया. अब मैं उन दोनों को आपके पास भेज रहीं हूँ. और क्या लिखूं? आपकी अपनी सावित्री
2021-05-26
07 min
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27 - (लघु कथा) चतुर तोता - मौलाना जलालुद्दीन रुमी
चतुर तोता - मौलाना जलालुद्दीन रुमी एक व्यापारी ने एक हिंदुस्तानी तोता पाल रखा था। वह उसे पिंजड़े में सदैव बंद रखता था। एक बार व्यापार के सिलसिले में वह हिंदुस्तान जाने को हुआ। उसने तोते से पूछा, “अपनी बिरादरी के भाई-बंदों के लिए अगर कोई संदेश भिजवाना हो, तो मुझे बता दो। मैं तुम्हारा संदेश उन तक पहुंचा दूंगा।" तोते ने कहा कि मेहरबानी करके उन्हें सिर्फ इतना बता दीजिएगा कि मुझे यहां रात-दिन पिंजड़े में बंद रहना पड़ता है। व्यापारी ने वादा किया कि यह खबर वह उसके संगी-साथियों तक जरूर पहुंचा देगा। हिंदुस्तान पहुंचने पर तोतों का जो पहला झुंड उसे मिला, उसी को उसने अपने तोते का संदेश सुना दिया। संदेश सुनते ही उनमें से एक तोता ज़मीन पर गिर गया। यह देख व्यापारी बड़ा दुःखी हुआ। कैसा मनहूस संदेश उसके तोते ने भिजवाया था जिसे सुनते ही उसका एक बिरादर चल बसा! घर वापस लौट कर उसने अपने तोते की कड़ी लानत-मलामत की और उसे बताया कि किस तरह उसका संदेश सुनकर एक भोला पंछी गिर कर मर गया। व्यापारी से यह दुःखद वृत्तांत सुन कर उसका तोता भी पिंजरे के पेंदे पर जा पड़ा। ऐसा लगा कि उसकी भी मृत्यु हो गई। व्यथित-हृदय व्यापारी ने दुःखी मन से पिंजड़े का दरवाजा खोला, मरे हुए तोते को बाहर निकाला और उसे घूरे पर डाल दिया। व्यापारी यह देखकर हैरत में आ गया कि उसके हाथ से छूटते ही मरा हुआ तोता जी उठा और फुर्र से उड़ कर एक पेड़ की ऊंची शाख पर जा बैठा। चतुर तोते ने व्यापारी को बताया कि वस्तुतः न तो वह मरा था और न ही उसका हिंदुस्तानी बिरादर। उसके साथी ने उसे पिंजरे से मुक्ति पाने की युक्ति सुझाई थी ।
2021-05-24
03 min
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26 - (साक्षात्कार) अलीबख्श के जीवन और ख्यालों पर जीवन सिंह से प्रोफेसर सुभाष चंद्र का साक्षात्कार
अलीबख्श रेवाड़ी-नारनौल क्षेत्र में सक्रिय थे। इनके कुल 9 ख्याल अथवा स्वांग कहे जाते हैं। इनके स्वागों में लोक जीवन का सत्य व साझी संस्कृति के दर्शन होते हैं। अलीबख्श के जीवन और ख्यालों पर आलोचक जीवन सिंह से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में हिंदी विभाग में प्रोफेसर व देसहरियाणा पत्रिका के संपादक सुभाष चंद्र का साक्षात्कार। इस साक्षात्कार में अलीबख्श के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियां शामिल हैं।
2021-05-24
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25 - (पत्र) सावित्रीबाई फुले का जोतीबा फुले को पहला पत्र
सावित्रीबाई फुले ने जोतीबा फुले को तीन पत्र लिखे। ये पत्र ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, जिनसे तत्कालीन समाज का विश्वसनीय ढंग से पता चलता है। फुले दंपति के संघर्षों व उनके प्रभाव की जानकारी मिलती है साथ ही इसका भी पता चलता है कि तत्कालीन स्वार्थी तत्व किस तरह उनको बदनाम करते थे। फुले दंपति के जीवन संघर्ष व भारतीय नवजागरण के समझने के लिए ये महत्वपूर्ण हैं।1856 में लिखा पहला पत्र यहां प्रस्तुत है। http://desharyana.in/archives/17649 अक्टूबर 1856 सच्चाई के अवतार, मेरे स्वामी ज्योतिबा, सावित्री आपको प्रणाम करती है, इतने सारे उलटफेर के बाद, अब यह लगता है कि मेरा स्वास्थ्य पूरी तरह से बहाल हो गया है. मेरी बीमारी के दौरान मेरे भाई ने अच्छी देखभाल और बहुत मेहनत की इससे उनकी सेवा और भक्ति भाव का पता चलता है. यह दर्शाना है कि वह वास्तव में कितना प्यार करते हैं. जैसे ही मैं पूरी तरह से स्वस्थ हो जाऊंगी, मैं पुणे आ जाऊंगी. कृपया मेरे बारे में चिंता मत करियेगा. मुझे पता है कि मेरी अनुपस्थिति में फ़ातिमा को बहुत परेशानी होती है, लेकिन मुझे यकीन है कि वह समझ जाएगी और बड़बड़ाएगी नहीं. हम एक दिन बातें कर रहे थे, मेरे भाई ने कहा, “आप और आपके पति को सही कारण से बहिष्कृत कर दिया गया है क्योंकि आप दोनों अस्पृश्य (महार और मांग) की सेवा करते हैं. अछूत लोग नीच होते हैं और उनकी मदद करके आप हमारे परिवार को बदनाम कर रहे हैं. इसी कारणवश मैं आपको समझाता हूँ कि हमारे जाति के रीति-रिवाजों के अनुसार व्यवहार करें और ब्राह्मणों के निर्देशों का पालन करें. मेरे भाई की इस तरह की बात से माँ परेशान हो गयीं थीं. वैसे तो मेरे भाई एक अच्छे इंसान हैं, पर वे बेहद संकीर्ण सोच रखते है और इसलिए उन्होंने हमारी कड़ी आलोचना और निंदा करने से परहेज़ नहीं किया. मेरी मां ने उन्हें न सिर्फ फटकारा बल्कि उन्हें अपने होश में लाने की कोशिश की, “भगवान ने तुम्हें एक खूबसूरत जीभ दी है, लेकिन इसका दुरुपयोग करना अच्छा नहीं है!” मैंने अपने सामाजिक कार्य का बचाव किया और उनकी गलतफहमी को दूर करने की कोशिश की. मैंने उससे कहा, “भाई, तुम्हारा मन संकीर्ण है, और ब्राह्मणों की शिक्षा ने इसे और बदतर बना दिया है. बकरियां और गायों जैसे जानवर आपके लिए अछूत नहीं हैं, आप प्यार से उन्हें स्पर्श करते हैं. आप नागपंचमी के दिन जहरीले सांप दूध पिलाते हैं. लेकिन आप महार और माँग को अछूतों के रूप में मानते हैं, जो आपके और मेरे जैसे ही मानव हैं. क्या आप मुझे इसके लिए कोई कारण दे सकते हैं? जब ब्राह्मण अपने पवित्र कर्तव्यों में अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो वे आपको भी अशुद्ध और अछूत मानते हैं, वे डरते हैं कि आपका स्पर्श उन्हें दूषित करेगा. वे आपके साथ भी महार जैसा ही व्यवहार करते हैं.” जब मेरे भाई ने यह सुना, तो उनका चेहरा लाल हो गया, लेकिन फिर उसने मुझसे पूछा, “आप उन महारों और मांगों को क्यों पढ़ाते हैं? लोग आपसे दुर्व्यवहार करते हैं क्योंकि आप अछूतों को पढ़ाते हैं. मैं इसे सहन नहीं कर सकता जब लोग ऐसा करने के लिए आपसे दुर्व्यवहार करते हैं और परेशानी पैदा करते हैं. मैं इस तरह के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकता हूँ.” मैंने उन्हें बताया कि अंग्रेजी का शिक्षण इन लोगों के लिए क्या कर रहा है. मैंने कहा, “सीखने की कमी और कुछ भी नहीं है लेकिन सकल पाशविकता है. यह ज्ञान के अधिग्रहण के माध्यम से ही (वह) अपने निम्न दर्जे से उठकर उच्चतर स्थान प्राप्त कर सकते हैं. मेरे पति एक भगवान की तरह आदमी है वह इस दुनिया की तुलना में परे है, कोई भी उनके समान नहीं हो सकता है वह सोचते हैं कि अछूतों को पढ़ना और स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहिए. वह ब्राह्मणों का सामना करते हैं और अछूतों के लिए शिक्षण और शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उनके साथ झगड़े करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि वे अन्य मनुष्यों जैसे हैं और उन्हें सम्मानित मनुष्यों के रूप में रहना चाहिए. इसके लिए उन्हें शिक्षित होना चाहिए. मैं उन्हें इस ही लिए सिखाता हूँ उसमें गलत क्या है? हां, हम दोनों लड़कियों, महिलाओं, मांग और महारों को पढ़ाते हैं. ब्राह्मण परेशान होते हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे उनके लिए समस्याएं पैदा हो जाएंगी. यही कारण है कि वे हमारा विरोध करते हैं और मंत्र की तरह जाप करते हैं कि यह हमारे धर्म के खिलाफ है. वे हमसे घृणा करते हैं और उनकी हमें बाहर फेंकने की कोशिश हैं और आप जैसे अच्छे लोगों के दिमाग में भी जहर भरते हैं .... मैं और क्या लिख सकती हूं? विनम्रता के साथ, आपकी अपनी, सावित्री
2021-05-24
11 min
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24. ( कविता ) सफलता की कुंजी - कुंवर नारायण
व्यवस्था के चरित्र को उदघाटित करती कविता जिसमें असली गुनाहगार साफ बचकर निकल जाता है और हमेशा मारा जाता है आम जन। सफलता की कुंजी - कुंवर नारायण दोनों के हाथों में भरी पिस्तौलें थीं दोनों एक-दूसरे से डरे हुए थे दोनों के दिल एक-दूसरे के लिए पुरानी नफ़रतों से भरे हुए थे उस वक़्त वहाँ वे दो ही थे लेकिन जब गोलियाँ चलीं मारा गया एक तीसरा जो वहाँ नहीं चाय की दुकान पर था... पकड़ा गया एक चौथा जो चाय की दुकान पर भी नहीं अपने मकान पर था, उसकी गवाही पर रगड़ा गया एक पाँचवाँ जिसे किसी छठे ने फँसवा दिया था - सातवें की शिनाख़्त पर मुक़द्दमा जिस आठवें पर चला, उसके फलस्वरूप सज़ा नवें को हुई और जो दसवाँ बिलकुल साफ़ छूटकर एक ग्यारहवें के सामने गिड़गिड़ाने लगा वह उसकी मार्फ़त एक नई सफलता तक पहुँचने की कुँजी को उँगलियों पर नचाने लगा...
2021-05-23
02 min
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23.( लघु कथा ) न्याय - एक लघु कथा
न्याय लघुकथा समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को दर्शाती है।
2021-05-23
03 min
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22. (कविता) दुनिया की चिंता - कुंवर नारायण
हिंदी साहित्यकार कुंवर नारायण की कविता दुनिया की चिंता एक विडंबना का व्यक्त करती है, कि बाहुबली व्यक्तियों के स्तर पर और देशों के स्तर पर जन हितैषी होने का दिखावा करते हैं, लेकिन असल में दुनिया को इन्हीं से चिंता है। दुनिया की चिंता छोटी सी दुनिया बड़े-बड़े इलाके हर इलाके के बड़े-बड़े लड़ाके हर लड़ाके की बड़ी-बड़ी बंदूकें हर बंदूक के बड़े-बड़े धड़ाके सबको दुनिया की चिंता सबसे दुनिया को चिंता।
2021-05-22
01 min
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21. Birsa Munda/( अमर सेनानी ) बिरसा मुंडा
Birsa Munda बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके साथियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। डोम्बरी पहाड़ पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत सी औरतें व बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 मार्च 1900 को गिरफ़्तार कर लिये गये। बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को ली, अंग्रेजों ने जहर देकर मार दिया। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छतीसगढ़ औऱ पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है। सलाम महान क्रांतिकारी को
2021-05-22
14 min
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20. ( कविता )एक अजीब-सी मुश्किल - कुंवर नारायण
हिंदी कविता एक अजीब-सी मुश्किल एक अजीब-सी मुश्किल में हूँ इन दिनों— मेरी भरपूर नफ़रत कर सकने की ताक़त दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही अँग्रेज़ी से नफ़रत करना चाहता जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया तो शेक्सपीयर आड़े आ जाते जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं मुसलमानों से नफ़रत करने चलता तो सामने ग़ालिब आकर खड़े हो जाते अब आप ही बताइए किसी की कुछ चलती है उनके सामने? सिखों से नफ़रत करना चाहता तो गुरु नानक आँखों में छा जाते और सिर अपने आप झुक जाता और ये कंबन, त्यागराज, मुत्तुस्वामी... लाख समझाता अपने को कि वे मेरे नहीं दूर कहीं दक्षिण के हैं पर मन है कि मानता ही नहीं बिना उन्हें अपनाए और वह प्रेमिका जिससे मुझे पहला धोखा हुआ था मिल जाए तो उसका ख़ून कर दूँ! मिलती भी है, मगर कभी मित्र कभी माँ कभी बहन की तरह तो प्यार का घूँट पीकर रह जाता हर समय पागलों की तरह भटकता रहता कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए जिससे भरपूर नफ़रत करके अपना जी हल्का कर लूँ पर होता है इसका ठीक उलटा कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी ऐसा मिल जाता जिससे प्यार किए बिना रह ही नहीं पाता दिनोंदिन मेरा यह प्रेम-रोग बढ़ता ही जा रहा और इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है कि वह किसी दिन मुझे स्वर्ग दिखाकर ही रहेगा।
2021-05-21
03 min
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19. ( कहानी ) अमृतसर आ गया है - भीष्म साहनी
https://desharyana.in/archives/17533 उन दिनों के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है, हम किसी झुटपुटे में जी रहे हैं। शायद समय बीत जाने पर अतीत का सारा व्यापार ही झुटपुटे में बीता जान पड़ता है। ज्यों-ज्यों भविष्य के पट खुलते जाते हैं, यह झुटपुटा और भी गहराता चला जाता है। उन्हीं दिनों पाकिस्तान के बनाए जाने का ऐलान किया गया था और लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे थे कि भविष्य में जीवन की रूपरेखा कैसी होगी। पर किसी की भी कल्पना बहुत दूर तक नहीं जा पाती थी। रावलपिंडी पाकिस्तान में जन्मे भीष्म साहनी (8 अगस्त 1915 - 11 जुलाई 2003) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से थे।
2021-05-20
30 min
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18. ( निबंध )पुरुष और परमेश्वर - रामवृक्ष बेनीपुरी
https://desharyana.in/archives/17525 रामवृक्ष बेनीपुरी (23 दिसंबर, 1899 - 7 सितंबर 1968) भारत के एक महान विचारक, चिन्तक, मनन करने वाले क्रान्तिकारी साहित्यकार, पत्रकार, संपादक थे। राष्ट्र-निर्माण, समाज-संगठन और मानवता के लिए ललित निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, आदि विविध विधाओं में महान रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। स्वतंत्रता संग्राम इसी समय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'रोल्ट एक्ट' के विरोध में 'असहयोग आन्दोलन' प्रारम्भ किया। ऐसे में बेनीपुरी जी ने भी कॉलेज त्याग दिया और निरंतर स्वतंत्रता संग्राम में जुड़े रहे। ये अपने जीवन के लगभग आठ वर्ष जेल में रहे। समाजवादी आन्दोलन से रामवृक्ष बेनीपुरी का निकट का सम्बन्ध था। 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के समय जयप्रकाश नारायण के हज़ारीबाग़ जेल से भागने में भी रामवृक्ष बेनीपुरी ने उनका साथ दिया और उनके निकट सहयोगी रहे।
2021-05-19
10 min
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17. ( अमर सेनानी) चंद्रवीर सिंह गढ़वाली
चन्द्र सिंह गढ़वाली गढ़वाल की राजधानी चांदपुरगढ़ के रहने वाले थे उनका जन्म 25 दिसम्बर 1891 में हुआ था। हिंदू मुस्लिम दंगे करवाने की साजिश को नाकाम करने के लिए अंग्रेजी सशस्त्र दल में बगावत की।उसकी सजा भुगती। उपेक्षित रहे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसे फौज में बगावत करने वालों में इनका प्रमुख नाम है।1994 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। 1 अक्टूबर 1979 को चन्द्रसिंह गढ़वाली का लम्बी बिमारी के बाद देहान्त हो गया। सलाम चंद्रवीर सिंह गढवाली को. जय हिंद
2021-05-19
07 min
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16. (कहानी) क्वारंटीन -राजेंद्र सिंह बेदी
राजेंद्र सिंह बेदी रचित उर्दू कहानी - क्वारंटीन! प्लेग और क्वारंटीन! हिमाला के पाँव में लेटे हुए मैदानों पर फैल कर हर एक चीज़ को धुंदला बना देने वाली कोहरे के मानिंद प्लेग के ख़ौफ़ ने चारों तरफ़ अपना तसल्लुत जमा लिया था। शहर का बच्चा बच्चा उसका नाम सुन कर काँप जाता था। प्लेग तो ख़ौफ़नाक थी ही, मगर क्वारंटीन उससे भी ज़्यादा ख़ौफ़नाक थी। लोग प्लेग से इतने हरासाँ नहीं थे जितने क्वारंटीन से, और यही वजह थी कि मोहक्मा-ए-हिफ़्ज़ान-ए-सेहत ने शहरियों को चूहों से बचने की तलक़ीन करने के लिए जो क़द-ए-आदम इश्तिहार छपवाकर दरवाज़ों, गुज़रगाहों और शाहराहों पर लगाया था, उसपर “न चूहा न प्लेग” के उनवान में इज़ाफ़ा करते हुए “न चूहा न प्लेग, न क्वारंटीन” लिखा था।
2021-05-18
26 min
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15. शहीद महावीर सिंह
शहीद भगतसिंह के साथी शहीद महावीर सिंह के जीवन, सोच व बलिदान की दास्तान बताता यह लेख लिखा था क्रांतिकारी इतिहासकार सुधीर विद्यार्थी ने. शहीद का जीवन बेहतर समाज चाहने वालों के लिए प्रेरक है। अपने पिका को लिखा उनका पत्र ऐतिहासिक दस्तावेज है.
2021-05-18
33 min
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14. (लोक कथा) प्यासा कौआ - बाल कथा
बचपन से कहानी सुनते आए हैं प्यासा कौआ। इसके संदेश जहां चाह वहां राह के संदेश की ओर ही ध्यान लगा रहा और इसकी बनावट पर कभी ध्यान ही नहीं गया। बदले संदर्भों में प्यासा कौअ.
2021-05-16
03 min
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13. ( लघु कथा ) पागलखाना - खलील जिब्रान
खलील जिब्रान की लघुकथा पागलखाना व्यंग्य है सामाजिक संरचनाओं पर जो व्यक्तित्व को अपनी तरह से विकसित का मौका नहीं देती. सामाजिक हों या शैक्षिक समस्त संस्थाएं व संबंध व्यक्ति को अपने जैसा बनाना चाहती हैं।
2021-05-16
02 min
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12. ( लोक कथा) शिवजी पार्वती: धार्मिक पाखंड की पड़ताल (हरियाणवी लोक कथा)
शिवजी पार्वती द्वारा धार्मिक पाखंड की पड़ताल हरियाणवी लोक कथा है। इस लोक कथा में धर्म के नाम पर किये जाने वाले पाखण्डों पर करारा व्यंग्य है.
2021-05-16
09 min
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11. ( लोक कथा ) गादड़ अर शेरणी - हरियाणवी लोक कथा
गादड़ अर शेरणी - हरियाणवी लोक कथा. समाज में व्याप्त द्वेष, शत्रुता व बदले की भावना की ओर संकेत करती लोककथा.
2021-05-14
05 min
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10. ( लोक कथा ) लछमी और टोटा - हरियाणवी लोक कथा
लछमी और टोटा - हरियाणवी लोक कथा सुख, समृद्धि और संपति आती है तो स्वागत करना इंसान का स्वभाव है और कंगाली आती अच्छी नहीं लगती.
2021-05-14
03 min
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9. ( लोक कथा ) चिड़िया और कौवा - हरियाणवी लोक कथा
चिड़िया और कौवा - हरियाणवी लोक कथा. मुफ्तखोर अपनी चालाकी से भोलेभाले लोगों की मेहनत के फल को लूट सकता है, लेकिन जीत न्याय की होगी और अंततः प्रकृति करेगी न्याय.
2021-05-14
05 min
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8. ( पत्र ) शहीद भगतसिंह व बटुकेश्वर का विद्यार्थियों के नाम पत्र
शहीद भगतसिंह व बटुकेश्वर का विद्यार्थियों के नाम पत्र
2021-05-12
03 min
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7. (साक्षात्कार ) लोक साहित्य का अध्ययन
लोक साहित्य के अध्ययन व मूल्यांकन पर विचारोत्तेजक परिचर्चा। प्रख्यात आलोचक जीवन सिंह से देस हरियाणा पत्रिका के संपादक प्रोफेसर सुभाष चंद्र के सवाल।
2021-05-12
44 min
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6. ( भाषा ) हिंदी भाषा का विकास - डा. सुभाष चंद्र
हिंदी भाषा का विकास - डा. सुभाष चंद्र
2021-05-12
21 min
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5. ( जीवन वृत ) रवींद्रनाथ टैगोरः जीवन एवं साहित्य
Ravinder Nath Tagore Life and Work
2021-05-12
33 min
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4. (संस्मरण ) मुक्तिबोध के जीवन के अंतिम सात वर्ष
कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार व उपन्यासकार लिखने वाले चुनिंदा लेखकों में से एक थे मुक्तिबोध. बीसवीं सदी की प्रगतिशील हिंदी कविता और आधुनिक कविता के बीच का सेतु माने जाने वाले प्रख्यात गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में डॉक्टर नामवर सिंह ने कहा था- 'नई कविता में मुक्तिबोध की जगह वही है ,जो छायावाद में निराला की थी. निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपनी युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उनकी सीमा की चुनौती देकर उस सर्जनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन हो सका'. गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नबम्बर, 1917 में म.प्र. के शिवपुरी में हुआ था । आर्थिक संकटों के बावजूद इन्होंने अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच एवं वैज्ञानिक उपन्यासों में विशेष रूचि ली । 11 सितम्बर 1964 में मृत्यु हुई । गजानन माधव मुक्ति बोध की रचनाएँ कविता संग्रह-’’चाँद का मुँह टेढ़ा हैं’’ तार सप्तक । समीक्षा- एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक डायरी, भारत इतिहास और संस्कृति, नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र । कहानी संग्रह- काठ का सपना, सतह से उठता आदमी । निबन्ध- नये निबन्ध, न कविता का आत्म संघर्ष । उपन्यास-विपात्र । गजानन माधव मुक्तिबोध का छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से बहुत गहरा नाता रहा है. मुक्तिबोध ने राजनंदगांव में रहते हुए अपना गहन साहित्य रचा. 'ब्रह्मराक्षस' और 'अंधेरे में' मुक्तिबोध का सांसारिक संघर्ष निखरकर सामने आया है. वह 1958 से से लेकर मौत तक वह राजनांदगांव दिग्विजय कॉलेज से जुड़े रहे. यहीं पर उनके निवास स्थल को मुक्तिबोध स्मारक के रूप में यादगार बनाकर वहां हिंदी के दो अन्य साहित्यकार पदुमलाल बख्शी और डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को संजोते हुए 2005 में एक संग्रहालय की स्थापना भी की गई. मुक्तिबोध को अपने जीवन काल में न तो बहुत पहचान मिली और न ही उनका कोई भी कविता संग्रह प्रकाशित हो सका. मौत के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल 'एक साहित्यिक की डायरी' प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनके मौत के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ. ज्ञानपीठ ने ही 'चांद का मुंह टेढ़ा है' प्रकाशित किया था. लेकिन उनकी असमय मृत्यु के बाद ही मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर छा गए.
2021-05-11
17 min
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3 - (पत्र) शहीद भगतसिंह का पत्र छोटे भाई कुलतार के नाम
3 मार्च 1931 को शहीद भगत सिंह ने अपने छोटे भाई कुलतार के नाम जो अंतिम पत्र लिखा था. सेंट्रल जेल, लाहौर, 3 मार्च 1931 अजीज कुलतार सिंह, आज तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर बहुत रंज हुआ। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था। तुम्हारे आंसू हमें बर्दाश्त न हुए। बरखुर्दार, हिम्मत से तालीम हासिल करते जाना और सेहत का ख़याल रखना। और क्या लिखूं हौंसला रखना, सुनो - उसे यह फ़िक्र है हरदम नई तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है हमे यह शौक़ है देखें सितम की इंतेहा क्या है दहर से क्यों ख़फा रहे, चर्ख़ का क्यों गिला करें सारा जहां अदू सही औओ मुक़ाबला करें कोई दम का मेहमां हूं अहले महफ़िल चिरागे-सहर हूं बुझा चाहता हूं आबो हवा में रहेगी, ख़याल की बिजली ये मुश्ते खाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे अच्छा खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं हिम्मत से रहना। तुम्हारा भाई- भगत सिंह
2021-05-11
02 min
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2 - (निबंध) साहित्य के दृष्टिकोण - मुक्तिबोध
गजानन माधव मुक्तिबोध के लेख साहित्य के दृष्टिकोण का वाचन.
2021-05-11
17 min
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1 - (कहानी) परदा - यशपाल
हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार यशपाल की कहानी परदा
2021-05-09
22 min