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Rani Ratta

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KATHASAGAR BY RANI RATTA2024-03-0247 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2024-02-241h 49KATHASAGAR BY RANI RATTA2022-12-2605 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2022-10-1707 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2022-09-0326 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2022-05-1823 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2022-02-2507 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2022-02-1707 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2022-01-1613 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-1015 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0928 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0812 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0713 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0510 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0416 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0338 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0210 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-09-0110 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-3116 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-3016 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2925 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2728 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2616 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2516 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2422 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2336 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-2226 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-211h 13KATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1919 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1933 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1813 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1726 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1516 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1323 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1216 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-1130 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0929 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0814 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0714 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0616 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0628 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0410 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0438 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0129 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-08-0128 minKATHASAGAR BY RANI RATTA
KATHASAGAR BY RANI RATTAKatil ki Maa by Premchand narrated by Rani RattaMunshi premchand ki kahani Qatil मुंशी प्रेमचंद की कहानी कातिल: जाड़ों की रात में धर्मवीर अपनी माँ से बात कर रहा होता है कि यहाँ लोग कितनी जल्दी सो जाते है जबकि यूरोप जैसे देशों में तो इस वक़्त सैर सपाटा किया जा रहा होता है। इसी तरह की बातें दोनों के बीच हो रही होती है। धर्मवीर के पिता की मृत्यु जेल में हुयी थी क्योंकि उन पे राजद्रोहात्मक भाषण देने का अपराध सिद्ध हुआ था । इसके बाद उसकी माँ ने राष्ट़ की सेवा करने की मानो कसम खा ली हो । धर्मवीर ने भी पहले स्वयं सेवकों में खुद को शमिल किया परन्तु जल्द ही वो एक नयी सभा में शरीक हो गया । माँ ने उसकी नयी सभा के बारे में पूछना शुरू किया तो धर्मवीर नयी सभी की तारीफ और कमजोरियों पर बात करने लगा। धर्मवीर बताने लगा कि सिर्फ झूलुस निकालने से आज़ादी न मिलेगी इसके लिए कीमत चुकानी होती है तो माँ ने कहा क्या हम लोगो ने इस आज़ादी के लिए आज तक कोई कीमत नहीं चुकाई, हम जेल गए डंडे खाए। धर्मवीर ने समझाया कि इस तरफ आज़ादी मांगने से अंगेजों को क्या नुकसान हुआ उन्हें तो कोई फर्क नही पड़ा। आज़ादी लेनी है तो अंग्रेजो के दिल में खौफ भरना होगा। धर्मवीर के मुंह से इस तरह की बात सुन उसकी माँ सिहर उठी आखिर अब वही तो सहारा था अपनी माँ का। माँ चिंता के सागर में डूबकी लगाने लगी परन्तु धर्मवीर अपनी बात पर जस का तस रहा। माँ को अब अपने लड़के को सुरक्षित रखने की चिंता सताने लगी और वो भगवान से अपनी बेटे के हृदय परिवर्तन की कामना करने लगी | माँ ने एक बार फिर धर्मवीर को समझाने की निरथक कोशिश की । पुलिस के बड़े अफसर को मारने का हुकुम धर्मवीर को मिला। जब माँ को ये बात पता चली तो उसने एक बार फिर धर्मवीर को समझाना चाहा। इस बार माँ ने मानो धर्मवीर को कुछ पल के लिए उसके पथ से उसे भटका दिया हो पर जल्द ही वो होश में आ गया और अपनी जिद्द पर अडिग हो गया। अपने काम को अंजाम देने से पूर्व धर्मवीर ने भावुक करने वाली बातें अपनी डायरी में लिखी । दोनों वहां पहुँच गए जहाँ घटना को अंजाम देना था । मगर माँ ये देख चौक गयी कि अफसर अकेला नहीं है उसकी पत्नी भी उसके साथ है । उसने अपने बेटे को रोकने की कोशिश की और दोनों में हाथापाई हो गयी जिसमे धर्मवीर के हाथों उसकी ही माँ की हत्या हो गयी । आइए खुलासा डॉट इन में विस्तार से पढ़िए मुंशी प्रेमचंद की कहानी कातिल।
2021-07-3118 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-3022 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2933 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2803 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2605 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2505 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2412 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2313 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2229 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2121 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-2019 minKATHASAGAR BY RANI RATTA
KATHASAGAR BY RANI RATTABair ka Aant by Premchand narrated by Rani Rattaरामेश्वरराय अपने बड़े भाई के शव को खाट से नीचे उतारते हुए भाई से बोले-तुम्हारे पास कुछ रुपये हों तो लाओ, दाह-क्रिया की फिक्र करें, मैं बिलकुल खाली हाथ हूँ। छोटे भाई का नाम विश्वेश्वरराय था। वह एक जमींदार के कारिंदा थे, आमदनी अच्छी थी। बोले, आधे रुपये मुझसे ले लो। आधे तुम निकालो। रामेश्वर-मेरे पास रुपये नहीं हैं। विश्वेश्वर-तो फिर इनके हिस्से का खेत रेहन रख दो। रामे.-तो जाओ, कोई महाजन ठीक करो। देर न लगे। विश्वेश्वरराय ने अपने एक मित्र से कुछ रुपये उधार लिये, उस वक्त का काम चला। पीछे फिर कुछ रुपये लिये, खेत की लिखा-पढ़ी कर दी। कुल पाँच बीघे जमीन थी। 300 रु. मिले। गाँव के लोगों का अनुमान है कि क्रिया-कर्म में मुश्किल से 100 रु. उठे होंगे। पर विश्वेश्वरराय ने षोड्शी के दिन 301 रु. का लेखा भाई के सामने रख दिया। रामेश्वरराय ने चकित हो कर पूछा-सब रुपये उठ गये ? विश्वे.-क्या मैं इतना नीच हूँ कि करनी के रुपये भी कुछ उठा रखूँगा ? किसको यह धन पचेगा ? रामे.-नहीं, मैं तुम्हें बेईमान नहीं बनाता, खाली पूछता था। विश्वे.-कुछ शक हो तो जिस बनिये से चीज़ें ली गयी हैं, उससे पूछ लो। 2 साल भर के बाद एक दिन विश्वेश्वरराय ने भाई से कहा-रुपये हों तो लाओ, खेत छुड़ा लें। रामे.-मेरे पास रुपये कहाँ से आये। घर का हाल तुमसे छिपा थोड़े ही है। विश्वे.-तो मैं सब रुपये देकर जमीन छोड़ाये लेता हूँ। जब तुम्हारे पास रुपये हों, आधा दे कर अपनी आधी जमीन मुझसे ले लेना। रामे.-अच्छी बात है, छुड़ा लो। 30 साल गुजर गये। विश्वेश्वरराय जमीन को भोगते रहे, उसे खाद गोबर से खूब सजाया। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि यह जमीन न छोड़ूँगा। मेरा तो इस पर मौरूसी हक हो गया। अदालत से भी कोई नहीं ले सकता। रामेश्वरराय ने कई बार यत्न किया कि रुपये दे कर अपना हिस्सा ले लें; पर तीस साल में वे कभी 150 रु. जमा न कर सके। मगर रामेश्वरराय का लड़का जागेश्वर कुछ सँभल गया। वह गाड़ी लादने का काम करने लगा था और इस काम में उसे अच्छा नफा भी होता था। उसे अपने हिस्से की रात-दिन चिंता रहती थी। अंत में उसने रात-दिन श्रम करके यथेष्ट धन बटोर लिया और एक दिन चाचा से बोला-काका, अपने रुपये ले लीजिए। मैं अपना नाम चढ़वा लूँ। विश्वे.-अपने बाप के तुम्हीं चतुर बेटे नहीं हो। इतने दिनों तक कान न हिलाये, जब मैंने जमीन सोना बना लिया तब हिस्सा बाँटने चले हो ? तुमसे माँगने तो नहीं गया था। जागे.-तो अब जमीन न मिलेगी ? रामे.-भाई का हक मार कर कोई सुखी नहीं रहता। विश्वे.-जमीन हमारी है। भाई की नहीं। जागे.-तो आप सीधे न दीजिएगा ? विश्वे.-न सीधे दूँगा, न टेढ़े से दूँगा। अदालत करो। जागे.-अदालत करने की मुझे सामर्थ्य नहीं है; पर इतना कहे देता हूँ कि जमीन चाहे मुझे न मिले; पर आपके पास न रहेगी। विश्वे.-यह धमकी जा कर किसी और को दो। जागे.-फिर यह न कहियेगा कि भाई हो कर वैरी हो गया। विश्वे.-एक हजार गाँठ में रख कर तब जो कुछ जी में आये, करना। जागे.-मैं गरीब आदमी हजार रुपये कहाँ से लाऊँगा; पर कभी-कभी भगवान् दीनों पर दयालु हो जाते हैं। विश्वे.-मैं इस डर से बिल नहीं खोद रहा हूँ। रामेश्वरराय तो चुप ही रहा पर जागेश्वर इतना क्षमाशील न था। वकील से बातचीत की। वह अब आधी नहीं; पूरी जमीन पर दाँत लगाए हुए था। मृत सिद्धेश्वरराय के एक लड़की तपेश्वरी थी। अपने जीवन-काल में वे उसका विवाह कर चुके थे। उसे कुछ मालूम ही न था कि बाप ने क्या छोड़ा और किसने लिया। क्रिया-कर्म अच्छी तरह हो गया; वह इसी में खुश थी। षोड्शी में आयी थी। फिर ससुराल चली गयी। 30 वर्ष हो गये, न किसी ने बुलाया, न वह मैके आयी। ससुराल की दशा भी अच्छी न थी। पति का देहांत हो चुका था। लड़के भी अल्प वेतन पर नौकर थे। जागेश्वर ने अपनी फूफी को उभारना शुरू किया। वह उसी को मुद्दई बनाना चाहता था। तपेश्वरी ने कहा-बेटा, मुझे भगवान् ने जो दिया है, उसी में मगन हूँ। मुझे जगह-जमीन न चाहिए। मेरे पास अदालत करने को धन नहीं है। जागे.-रुपये मैं लगाऊँगा, तुम खाली दावा कर दो। तपेश्वरी-भैया तुम्हें खड़ा कर किसी काम का न रखेंगे। जागे.-यह नहीं देखा जाता कि वे जायदाद ले कर मजें उड़ावें और हम मुँह ताकें। मैं अदालत का खर्च दे दूँगा। इस जमीन के पीछे बिक जाऊँगा पर उनका गला न छोड़ू़़ँगा। तपेश्वरी-अगर जमीन मिल भी गयी तो तुम अपने रुपयों के एवज में ले लोगे, मेरे हाथ क्या लगेगा ? मैं भाई से क्यों बुरी बनूँ ? जागे.-जमीन आप ले लीजिएगा, मैं केवल चाचा साहब का घमंड तोड़ना चाहता हूँ। तपेश्वरी-अच्छा, जाओ, मेरी तरफ से दावा कर दो। जागेश्वर ने सोचा, जब चाचा साहब की मुट्ठी से जमीन निकल आयेगी तब मैं दस-पाँच रुपये साल पर इनसे ले लूँगा। इन्हें अभी कौड़ी नहीं मिलती। जो कुछ मिलेगा, उसी को बहुत समझेंगी। दूसरे दिन दावा कर दिया। मुंसिफ के इजलास में मुकदमा पेश हुआ। विश्वेश्वर
2021-07-1920 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-1820 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-1317 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-1320 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-1111 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-1011 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0921 minKATHASAGAR BY RANI RATTA
KATHASAGAR BY RANI RATTAPashu se Manushya by Premchand narrated by Rani Rattaबार-ऐट ला, के यहाँ नौकर था। पाँच रुपये मासिक वेतन पाता था। उसके घर में स्त्री और दो-तीन छोटे बच्चे थे। स्त्री पड़ोसियों के लिए गेहूँ पीसा करती थी। दो बच्चे, जो समझदार थे, इधर-उधर से लकड़ियाँ, गेहूँ, उपले चुन लाते थे। किंतु इतना यत्न करने पर भी वे बहुत तकलीफ में रहते थे। दुर्गा, डॉक्टर साहब की नजर बचा कर बगीचे से फूल चुन लेता और बाजार में पुजारियों के हाथ बेच दिया करता था। कभी-कभी फलों पर भी हाथ साफ किया करता। यही उसकी ऊपरी आमदनी थी। इससे नोन-तेल आदि का काम चल जाता था। उसने कई बार डॉक्टर महोदय से वेतन बढ़ाने के लिए प्रार्थना की, परंतु डॉक्टर साहब नौकर की वेतन-वृद्धि को छूत की बीमारी समझते थे, जो एक से अनेक को ग्रस लेती है। वे साफ कह दिया करते कि, ‘‘भाई मैं तुम्हें बाँधे तो हूँ नहीं। तुम्हारा निर्वाह यहाँ नहीं होता; तो और कहीं चले जाओ, मेरे लिए मालियों का अकाल नहीं है।’’ दुर्गा में इतना साहस न था कि वह लगी हुई रोजी छोड़ कर नौकरी ढूँढ़ने निकलता। इससे अधिक वेतन पाने की आशा भी नहीं। इसलिए वह इसी निराशा में पड़ा हुआ जीवन के दिन काटता और अपने भाग्य को रोता था। डॉक्टर महोदय को बागबानी से विशेष प्रेम था। नाना प्रकार के फूल-पत्ते लगा रखे थे। अच्छे-अच्छे फलों के पौधे दरभंगा, मलीहाबाद, सहारनपुर आदि स्थानों से मँगवा कर लगाये थे। वृक्षों को फलों से लदे हुए देख कर उन्हें हार्दिक आनंद होता था। अपने मित्रों के यहाँ गुलदस्ते और शाक-भाजी की डालियाँ तोहफे के तौर पर भिजवाते रहते थे। उन्हें फलों को आप खाने का शौक न था, पर मित्रों को खिलाने में उन्हें असीम आनंद प्राप्त होता था। प्रत्येक फल के मौसम में मित्रों की दावत करते, और ‘पिकनिक पार्टियाँ’ उनके मनोरंजन का प्रधान अंग थीं। एक बार गर्मियों में उन्होंने अपने कई मित्रों को आम खाने की दावत दी। मलीहाबादी में सुफेदे के फल खूब लगे हुए थे। डॉक्टर साहब इन फलों को प्रतिदिन देखा करते थे। ये पहले ही फले थे, इसलिए वे मित्रों से उनके मिठास और स्वाद का बखान सुनना चाहते थे। इस विचार से उन्हें वही आमोद था, जो किसी पहलवान को अपने पट्ठों के करतब दिखाने से होता है। इतने बड़े सुन्दर और सुकोमल सुफेदे स्वयं उनकी निगाह से न गुजरे थे। इन फलों के स्वाद का उन्हें इतना विश्वास था कि वे एक फल चख कर उनकी परीक्षा करना आवश्यक न समझते थे, प्रधानतः इसलिए कि एक फल की कमी एक मित्र को रसास्वादन से वंचित कर देगी। संध्या का समय था, चैत का महीना। मित्रगण आ कर बगीचे के हौज के किनारे कुरसियों पर बैठे थे। बर्फ और दूध का प्रबन्ध पहले ही से कर लिया गया था, पर अभी तक फल न तोड़े गये थे। डॉक्टर साहब पहले फलों को पेड़ में लगे हुए दिखला कर तब उन्हें तोड़ना चाहते थे, जिसमें किसी को यह संदेह न हो कि फल इनके बाग के नहीं हैं। जब सब सज्जन जमा हो गये तब उन्होंने कहा आप लोगों को कष्ट होगा, पर जरा चलकर फलों को पेड़ में लटके हुए देखिए। बड़ा ही मनोहर दृश्य है। गुलाब में भी ऐसी लोचनप्रिय लाली न होगी। रंग से स्वाद टपक पड़ता है। मैंने इसकी कलम खास मलीहाबाद से मँगवायी थी और उसका विशेष रीति से पालन किया है। मित्रगण उठे। डॉक्टर साहब आगे-आगे चले रविशों के दोनों ओर गुलाब की क्यारियाँ थीं। उनकी छटा दिखाते हुए वे अन्त में सुफेदे के पेड़ के सामने आ गये। मगर, आश्चर्य ! वहाँ एक फल भी न था। डॉक्टर साहब ने समझा, शायद वह यह पेड़ नहीं है। दो पग और आगे चले, दूसरा पेड़ मिल गया। और आगे बढ़े, तीसरा पेड़ मिला। फिर पीछे लौटे और एक विस्मित
2021-07-0831 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0624 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0635 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0510 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0416 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0319 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0130 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-07-0110 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-3029 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-2818 minKATHASAGAR BY RANI RATTA
KATHASAGAR BY RANI RATTAAttmaram by Premchand narrated by Rani Rattaवेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रातः से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज़ गायब हो गयी। वह नित्य-प्रति एक बार प्रातःकाल अपने तोते का पिंजड़ा लिए कोई भजन गाता हुआ तालाब की ओर जाता था। उस धुँधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर, पोपला मुँह और झुकी हुई कमर देख कर किसी अपरिचित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। ज्यों ही लोगों के कानों में आवाज आती-‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’, लोग समझ जाते कि भोर हो गयी। महादेव का पारिवारिक जीवन सुखमय न था। उसके तीन पुत्र थे, तीन बहुएँ थीं, दर्जनों नाती-पोते थे, लेकिन उसके बोझ को हलका करनेवाला कोई न था। लड़के कहते-‘जब तक दादा जीते हैं, हम जीवन का आनंद भोग लें, फिर तो यह ढोल गले पड़ेगी ही।’ बेचारे महादेव को कभी-कभी निराहार ही रहना पड़ता। भोजन के समय उसके घर में साम्यवाद का ऐसा गगनभेदी निर्घोष होता कि वह भूखा ही उठ जाता, और नारियल का हुक्का पीता हुआ सो जाता। उसका व्यावसायिक जीवन और भी अशांतिकारक था। यद्यपि वह अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई औरों से कहीं ज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासायनिक क्रियाएँ कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे आये दिन शक्की और धैर्य-शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते थे। पर महादेव अविचलित गाम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना करता था। ज्यों ही यह कलह शांत होता, वह अपने तोते की ओर देख कर पुकार उठता-‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।’ इस मंत्र को जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शांति प्राप्त हो जाती थी। 2 एक दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया। तोता उड़ गया। महादेव ने सिर उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन्न-से हो गया। तोता कहाँ गया। उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता गायब था ! महादेव घबड़ा कर उठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी, तो वह यही तोता। लड़के-बालों, नाती-पोतों से उसका जी भर गया था। लड़कों की चुलबुल से उसके काम में विघ्न पड़ता था। बेटों से उसे प्रेम न था; इसलिए नहीं कि वे निकम्मे थे, बल्कि इसलिए कि उनके कारण वह अपने आनंददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वंचित रह जाता था। पड़ोसियों से उसे चिढ़ थी, इसलिए कि वे अँगीठी से आग निकाल ले जाते थे। इन समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो वह यही तोता था। इससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस अवस्था में था जब मनुष्य को शांति भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती। तोता एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखा कर कहने लगा-‘आ-आ’ ‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।’ लेकिन गाँव और घर के लड़के एकत्र हो कर चिल्लाने और तालियाँ बजाने लगे। ऊपर से कौओं ने काँव-काँव की रट लगायी ? तोता उड़ा और गाँव से बाहर निकल कर एक पेड़ पर जा बैठा। महादेव खाली पिंजड़ा लिये उसके पीछे दौड़ा, सो दौड़ा। लोगों को उसकी दु्रतगामिता पर अचम्भा हो रहा था। मोह की इससे सुंदर, इससे सजीव, इससे भावमय कल्पना नहीं की जा सकती। दोपहर हो गयी थी। किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे। उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला। महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था। किसी ने कंकड़ फेंके, किसी ने तालियाँ बजायीं। तोता फिर उड़ा और वहाँ से दूर आम के बाग में एक पेड़ की फुनगी पर जा बैठा। महादेव फिर खाली पिंजड़ा लिये मेंढक की भाँति उचकता चला। बाग में पहुँचा तो पैर के तलुओं से आग निकल रही थी; सिर चक्कर खा रहा था। जब जरा सावधान हुआ, तो फिर पिंजड़ा उठा कर कहने लगा-‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।’ तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पर आ बैठा, किन्तु महादेव की ओर सशंक नेत्रों से ताक रहा था। महादेव ने समझा, डर रहा है। वह पिंजड़े को छोड़ कर आप एक दूसरे पेड़ की आड़ में छिप गया। तोते ने चारों ओर गौर से देखा, निश्शंक हो गया, उतरा और आ कर पिंजड़े के ऊपर बैठ गया। महादेव का हृदय उछलने लगा। ‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ का मंत्र जपता हुआ धीरे-धीरे तोते के समीप आया और लपका कि तोते को पकड़ ले; किन्तु तोता हाथ न आया, फिर पेड़ पर जा बैठा। शाम तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी पिंजड़े पर आ बैठता, कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठ अपने दाना-पानी की प्यालियों को देखता, और फिर उड़ जाता। बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था, तो तोता मूर्तिमयी माया। यहाँ तक कि शाम हो गयी। माया और मोह का यह संग्राम अंधकार में विलीन हो गया।
2021-06-2721 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-2611 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-2514 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-2331 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-2213 minKATHASAGAR BY RANI RATTA
KATHASAGAR BY RANI RATTASavtava Raksha by Premchand narrated by Rani Rattaमीर दिलावर अली के पास एक बड़ी रास का कुम्मैत घोड़ा था। कहते तो वह यही थे कि मैंने अपनी जिन्दगी की आधी कमाई इस पर खर्च की है, पर वास्तव में उन्होंने इसे पलटन से सस्ते दामों मोल लिया था। यों कहिए कि यह पलटन का निकाला हुआ घोड़ा था। शायद पलटन के अधिकारियों ने इसे अपने यहाँ रखना उचित न समझ कर नीलाम कर दिया था। मीर साहब कचहरी में मोहर्रिर थे। शहर के बाहर मकान था। कचहरी तक आने में तीन मील की मंजिल तय करनी पड़ती थी, एक जानवर की फिक्र थी। यह घोड़ा सुभीते से मिल गया, ले लिया। पिछले तीन वर्षों से वह मीर साहब की ही सवारी में था। देखने में तो उसमें कोई ऐब न था, पर कदाचित् आत्म-सम्मान की मात्र अधिक थी।
2021-06-2116 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1904 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1812 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1715 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1621 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1524 minKATHASAGAR BY RANI RATTA
KATHASAGAR BY RANI RATTAPurvsanskar by Premchand narrated by Rani Rattaसज्जनों के हिस्से में भौतिक उन्नति कभी भूल कर ही आती है। रामटहल विलासी, दुर्व्यसनी, चरित्राहीन आदमी थे, पर सांसारिक व्यवहारों में चतुर, सूद-ब्याज के मामले में दक्ष और मुकदमे-अदालत में कुशल थे। उनका धन बढ़ता था। सभी उनके असामी थे। उधर उन्हीं के छोटे भाई शिवटहल साधु-भक्त, धर्म-परायण और परोपकारी जीव थे। उनका धन घटता जाता था। उनके द्वार पर दो-चार अतिथि बने रहते थे। बड़े भाई का सारे मुहल्ले पर दबाव था। जितने नीच श्रेणी के आदमी थे, उनका हुक्म पाते ही फौरन उनका काम करते थे। उनके घर की मरम्मत बेगार में हो जाती। ऋणी कुँजड़े साग-भाजी भेंट में दे जाते। ऋणी ग्वाला उन्हें बाजार-भाव से ड्योढ़ा दूध देता। छोटे भाई का किसी पर रोब न था। साधु-संत आते और इच्छापूर्ण भोजन करके अपनी राह लेते। दो-चार आदमियों को रुपये उधार दिये भी तो सूद के लालच से नहीं, बल्कि संकट से छुड़ाने के लिए। कभी जोर दे कर तगादा न करते कि कहीं उन्हें दुःख न हो।
2021-06-1418 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1335 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1119 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-1017 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0911 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0812 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0713 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0522 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0423 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0314 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0213 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-06-0130 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-05-3109 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-05-3109 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-05-3012 minKATHASAGAR BY RANI RATTA2021-05-2928 min