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Sunny Parmar

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Devotional Lovers2021-04-0521 minDevotional Lovers2021-02-2810 minDevotional Lovers2021-02-2707 minDevotional Lovers
Devotional Lovers"मैं समय हूँ"-Episode 01 । श्री कृष्णा, भविष्यवाणी! हुए सत्य पर क्या है वो? Shree Krishna Stories."मैं समय हूँ"-Episode 01 । श्री कृष्णा, भविष्यवाणी! हुए सत्य पर क्या है वो? Shree Krishna Stories. हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहीं जाई ।  मुख तो तौ परि देखिए, जे मन की दुविधा जाई ॥   अर्थ :- संत कबीर जी कहते है कि मनुष्य के ह्रदय में ही आइना होता है लेकिन वह खुद को या वास्तविकता को नहीं देख पता है। वह खुद को या वास्तविकता को तभी देख पता है जब उसके मन की दुविधा अथार्थ संकट ख़त्म  हो जाती है। अथार्थ चिंता अथवा मन का कास्ट ऐसा चीज़ है जो मनुष्य को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। इतना की व्यक्ति खुद की पहचान भूलने लगता है।  इसलिए चिंता से हमे बच कर रहना चाहिए।  ___________________________
2021-02-2609 minDevotional Lovers2021-02-2542 minDevotional Lovers2021-02-2443 minDevotional Lovers2021-02-2342 minDevotional Lovers2021-02-2242 minDevotional Lovers2021-02-2144 minDevotional Lovers2021-02-2001 minDevotional Lovers2021-02-1948 minDevotional Lovers2021-02-1859 minDevotional Lovers2021-02-1740 minDevotional Lovers2021-02-1625 minDevotional Lovers2021-02-1513 minDevotional Lovers2021-02-1417 minDevotional Lovers2021-02-1317 minDevotional Lovers2021-02-1203 minDevotional Lovers2021-02-1116 minDevotional Lovers2021-02-1007 minDevotional Lovers2021-02-0910 minDevotional Lovers2021-02-081h 13Devotional Lovers2021-02-072h 00Devotional Lovers2021-02-0643 minDevotional Lovers2021-02-0535 minDevotional Lovers2021-02-0438 minDevotional Lovers2021-02-0336 minDevotional Lovers2021-02-0244 minDevotional Lovers2021-02-0130 minDevotional Lovers2021-01-311h 18Devotional Lovers2021-01-3056 minDevotional Lovers2021-01-291h 06Devotional Lovers2021-01-281h 00Devotional Lovers2021-01-2747 minDevotional Lovers2021-01-261h 06Devotional Lovers2021-01-2548 minDevotional Lovers2021-01-241h 29Devotional Lovers2021-01-231h 20Devotional Lovers2021-01-222h 11Devotional Lovers2021-01-211h 29Devotional Lovers2021-01-201h 13Devotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-18 (Part-18) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-18 (Part-18) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १८ सारांश / निष्कर्ष :- संन्यास योग यह गीता का समापन अध्याय है आरम्भ में ही अर्जुन का प्रश्न है प्रभो! मैं त्याग और संन्यास के भेद और स्वरूप को जानना चाहता हूँ। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस पर प्रचलित चार मतों की चर्चा की। इनमे एक सही भी था। इससे मिलता जुलता ही निर्णय योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दिया कि यज्ञ, दान और तप किसी काल में त्यागने योग्य नहीं है। ये मनुष्यों को भी पवित्र करने वाले है। इन तीनो को रखते हुए इनके विरोधी विचारो का त्याग करना ही वास्तविक त्याग है। यह सात्विक त्याग है। फल की इच्छा के साथ त्याग राजस है, मोहवश नियत कर्म का ही त्याग करना तामस त्याग है और संन्यास त्याग की ही चरमोत्कृष्ट अवस्था है नियत कर्म और ध्यान जनित सुख सात्त्विक है। इन्दिर्यो और विषयों का भोग राजस है और तृप्ति दायक अन्न की उत्पति से रहित दु:खद सुख तामस है। मनुष्य मात्र के द्वारा शास्त्र के अनुकूल अथवा प्रतिकूल कार्य होने में पाच कारण है कर्त्ता (मन), पृथक्-पृथक् कारण ( जिनके द्वारा किया जाता है। शुभ पार लगता है तो विवेक, वैराग्य, शम, दम करण है। अशुभ पार लगता है तो काम, क्रोध, राग द्वेष इत्यादि कारण होंगे ) नाना प्रकार की इच्छाएँ ( इच्छाएँ अनन्त है, सब पूर्ण नहीं हो सकती। केवल वह इच्छा पूर्ण होती है जिसके साथ आधार मिल जाता है। ) , चौथा कारण है आधार ( साधन ) और पांचवा हेतु है देव ( प्रारब्ध या संस्कार )। प्रत्येक कार्य के होने में यही पांच कारण है, फिर भी जो कैवल्य स्वरूप परमात्मा को कर्त्ता मानता है, वह मूढ़बुद्धि यथार्थ नहीं जानता। अथार्त भगवान नहीं करते, जबकि पीछे कह आये है कि अर्जुन! तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर रह, कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ। अन्तत: उन महापुरुष का आशय क्या है? वस्तुतः प्रक्रति और पुरुष के बीच एक आकर्षण सीमा है। जब तक मनुष्य प्रक्रति में बरतता है, तब तक माया प्रेरणा करती है और जब वह इससे ऊपर उठकर इष्ट को समर्पित हो जाता है और वह इष्ट ह्रदय देश में रथी हो जाता है, फिर भगवान कहते है। ऐसे स्तर पर अर्जुन था, संजय भी था और सबके लिये इस ( कक्षा ) में पहुचने का विधान है। अत: भगवान यहाँ प्रेरणा करते है। पूर्ण ज्ञाता महापुरुष, जानने की विधि और ज्ञेय परमात्मा – इन तीनो के संयोग से कर्म की प्रेरणा मिलती है। इसलिये किसी अनुभवी महापुरुष ( सद्गुरु ) के सान्निध्य में समझने का प्रयास करना चहिये। वर्ण-व्यवस्था के प्रश्न को चौथी बार लेते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, एकाग्रता, शरीर वाणी और मन को इष्ट के अनुरूप तपाना, ईश्वरीय जानकारी का संचार, ईश्वरीय निर्देशन पर चलने की क्षमता इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलाने वाली योग्यताये ब्राह्मण श्रेणी के कर्म है। शौर्य, पीछे न हटने का स्वाभाव, सब भावो पर स्वामीभाव, कर्म में प्रवृत्त होने की दक्षता क्षत्रिय श्रेणी का कर्म है। इन्द्रियों का संरक्षण, आत्मिक सम्पति का संवर्द्धन इत्यादि वैश्य श्रेणी के कर्म है और परिचर्या शूद्र श्रेणी का कर्म है। शूद्र का अर्थ है अल्पज्ञ। अल्पज्ञ साधक जो नियत कर्म चिन्तन में दो घंटे बैठकर दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पता। शरीर अवश्य बैठा है, लेकिन जिस मन को टिकाना चाहिये, वह तो हवा से बाते कर रहा है। ऐसे साधक का कल्याण कैसे हो? उसे अपने से उत्पन्न अवस्था वालो की अथवा सद्गुरु की सेवा करनी चाहिये। शनै:-शनै: उसमे भी संस्कारो का सृजन होगा, वह गति पकड़ लेगा। अत: इस अल्पज्ञ का कर्म सेवा से ही प्रारंभ होगा। कर्म एक ही है नियत कर्म, चिन्तन। उसके कर्ता के चार श्रेणियाँ– अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है। मनुष्य को नहीं बल्कि गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागो में बाँटा गया। गीतोक्त वर्ण इसने में ही है।
2021-01-191h 44Devotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-17 (Part-17) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-17 (Part-17) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १७ सारांश / निष्कर्ष :- ॐतत्सत् व श्रद्धात्रय विभाग योग अध्याय के आरम्भ में ही अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन! जो शास्त्रविधि को त्याग कर और श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते है ( लोग भुत, भवानी अन्यान्य पूजते ही रहते है) तो उनकी श्रद्धा कैसी है? सात्त्विकी है, राजसी है अथवा तामसी? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा। अर्जुन! यह पुरुष श्रद्धा का स्वरुप है, कही न कही उसकी श्रद्धा होगी ही। जैसी श्रद्धा वैसा पुरुष, जैसी वृत्ति वैसा पुरुष। उनकी वह श्रद्धा सात्विक, राजसी और तामसी तीनो प्रकार की होती है। सात्विक श्रद्धा वाले देवताओं को, राजसी श्रद्धा वाले यक्ष ( जो यश, शौर्य प्रदान करते है ), राक्षसों ( जो सुरक्षा दे सके ) का पीछा करते है और तामसी श्रद्धा वाले भूत प्रेतों को पूजते है। शास्त्र विधि से रहित इन पूजाओ द्वारा ये तीन प्रकार के श्रद्धालु शरीर में स्थित भूत समुदाय अथार्त अपने संकल्पों और ह्रदय देश में स्थित मुझ अन्तरयमी को भी कृश करते है, न कि पूजते है। उन सबको निश्चय ही तू असुर जान अथार्त भुत, प्रेत, यक्ष, राक्षस तथा देवताओं को पूजने वाले असुर है। देवता प्रसंग को श्रीकृष्ण ने यहाँ तीसरी बार उठाया है। पहले अध्याय सात में उन्होंने कहा कि अर्जुन! कामनायो ने जिनका ज्ञान हर लिया है, वही मूढ़बुद्धि अन्य देवताओं की पूजा करते है। दूसरी बार अध्याय नौ में उसी प्रश्न को दोहराते हुए कहा – जो अन्यान्य देवताओं की पूजा करते है, वे मुझे ही पूजते है, किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अथार्त शास्त्र में निर्धारित विधि से भिन्न है, अत: वह नष्ट हो जाता है। यहाँ अध्याय सत्रह उसी असुरी स्वभाव वाला कहकर संबोधित किया। श्रीकृष्ण के शब्दों में एक परमात्मा की ही पूजा का विधान है। तदंतर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने चार प्रश्न लिये- आहार, यज्ञ, तप और दान। आहार तीन प्रकार के होते है। सात्त्विक पुरुष को तो आरोग्य प्रदान करने वाले, स्वाभिक प्रिय लगने वाले, स्निग्ध आहार प्रिय होते है।तामस पुरुष को जूठा, बासी और अपवित्र आहार प्रिय होता है। शास्त्रविधि से निर्दिष्ट यज्ञ ( जो आराधना की अन्त: क्रियाएँ है ) जो मन का निरोध करता है, फलाकांक्षा से रहित वह यज्ञ सात्त्विक है। दम्भ-प्रदर्शन प्रदर्शन तथा फल के लिये किया जाने वाला वही यज्ञ राजस है और शास्त्रविधि से रहित, मन्त्र, दान तथा बग़ैर श्रद्धा से किया हुआ यज्ञ तामस है। परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलाने वाली सारी योग्यताएँ जिनमे है, उन प्राज्ञ सद्गुरु की अर्चना, सेवा और अन्त: करण से अहिंसा, ब्रह्मचर्य और पवित्रता के अनुरूप शरीर को तपाना शरीर का तप है। सत्य प्रिय और हितकर बोलना वाणी का तप है और मन को कर्म में प्रवृत्त रखना, इष्ट के अतिरिक्त विषयों के चिन्तन में मन को मोन रखना मन सम्बन्धी तप है। मन, वाणी और शरीर तीनो मिलाकर इस ओर तपाना सात्त्विक तप है। राजस तप कमनायाओ के साथ उसी को किया जाता है, जबकि तामस तप शास्त्रविधि से रहित स्वेच्छाचार है। कर्त्तव्य मानकर देश काल और पात्र का विचार करके श्रद्धा पूर्वक दिया जाने वाला दान सात्त्विक है। किसी लाभ के लोभ में कठिनाई से दिया जाने वाला दान राजस है और झिड़ककर कुपात्र को दिया जाने वाला दान तामस है। ॐ, तत् और सत् का स्वरुप बताते हुये श्रीकृष्ण ने कहा कि ये नाम परमात्मा की स्मृति दिलाते है। शास्त्रविधि से निर्धारित तप, दान और यज्ञ आरम्भ करने में ओम् प्रयोग होता है और पूर्ति में ही ओम् पिण्ड छोड़ता है। तत का अर्थ है वह परमात्मा , उसके प्रति समर्पित होकर ही वह कर्म होता है और कर्म जब धारावाही होने लगे, तब सत् का प्रयोग होता है। भजन ही सत् है। सत् के प्रति भाव और साधुभाव में ही सत् का प्रयोग किया जाता है। परमात्मा की प्राप्ति करा देने वाले कर्म यज्ञ, दान और तप के परिणाम में भी सत् का प्रयोग है और परमात्मा में प्रवेश दिला देने वाला कर्म निश्चय पूर्वक सत् है किन्तु इन सबके साथ श्रद्धा आवश्यक है श्रद्धा से रहित होकर किया हुआ कर्म, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप न इस जन्म में लाभकारी है, न अगले जन्मो में ही। अत: श्रद्धा अपरिहार्य है। सम्पूर्ण अध्याय में श्रद्धा पर प्रकाश डाला गया और अन्त में ॐ, तत् और सत् विशद व्याख्या प्रस्तुत की गयी, जो गीता के श्लोकों में पहली बार आया है। अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “ॐतत्सत् व श्रद्धात्रय विभाग योग” नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-1840 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-16 (Part-16) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-16 (Part-16) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १६ सारांश / निष्कर्ष :- दैवासुर सम्पद् विभाग योग इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी सम्पद का विस्तार से वर्णन किया। जिसमें ध्यान में स्थिति, सर्वस्व का समर्पण, अन्त: करण की शुद्धि इन्द्रियों का दमन, मन का समन, स्वरूप को स्मरण दिलाने वाला अध्ययन, यज्ञ के लिये प्रयत्न, मनसहित इन्द्रियों को तपाना, अक्रोध, चित्त का शान्त प्रवाहित रहना इत्यादि छब्बीस लक्षण बताये, जो सब के सब तो इष्ट के समीप पहुचें हुए योग-साधना में प्रवृत्त किसी साधक में सम्भव है। आंशिक रूप से सब में है। तदंतर उन्होंने आसुरी सम्पद में प्रधान चार से छ: विकारो का नाम लिया, जैसे अभिमान, दम्भ, कठोरता, अज्ञान इत्यादि और अन्त में निर्णय दिया कि अर्जुन! दैवी सम्पद तो ‘विमोक्षाय’- पूर्ण निवृत्ति के लिये है, परमपद की प्राप्ति के लिए है और असुरी सम्पद बंधन और अधोगति के लिये है। अर्जुन! तू शोक न कर, क्योकि तू दैवी सम्पद को प्राप्त हुआ है। ये सम्पदाएँ होती कहा है? उन्होने बताया की इस लोक में मनुष्यों के स्वभाव दो प्रकार के होते है देवताओं-जैसा और असुरो जैसा। जब दैवी सम्पद का बाहुल्य होता है तो मनुष्य असुरो जैसा है। सृष्टि में बस मनुष्यों की दो ही जाति है चाहे वह कही पैदा हुआ हो, कुछ भी कहलता हो। तत्पश्चात् उन्होंने ससुरी स्वभाव वाले मनुष्यों के लक्षणों का विस्तार से उल्लेख किया। आसुरी सम्पद को प्राप्त पुरुष कर्त्तव्य कर्म में प्रवृत्त होना नहीं जानता और अकर्त्तव्य कर्म से निवृत्त होना नहीं जानता। वह कर्म में जब प्रवृत्त ही नहीं हुआ तो न उसमें सत्य होता है, न शुद्धि और न आचारण ही होता है। उसके विचार में जगत आश्रय रहित, बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री-पुरुष के सयोग से उत्पन्न हुआ है, अत: केवल भोग भोगने के लिए है। इससे आगे क्या है? यह विचार कृष्ण काल में भी था। सदैव रहा है। केवल चार्वाक ने कहा हो, ऐसी बात नहीं है। जब तक जन मानस में दैवी-आसुरी सम्पद का उतार-चढ़ाव है तब तक रहेगा। श्रीकृष्ण कहते है वे मन्दबुद्धि वाले पुरुष सबका अहित (कल्याण का नाश) करने के लिए ही जगत में पैदा होते है। वे कहते है मेरे द्वारा यह शत्रु मारा गया, उसे मरूँगा। इस प्रकार अर्जुन! कम-क्रोध के आश्रित वे पुरुष शत्रुओ को नहीं मारते वल्कि अपने और दुसरो के शरीर में स्थित मुझ परमत्मा से द्वेष करने वाले है। तो क्या अर्जुन ने प्रण करके जयद्रथादि को मारा? यदि मरता है तो आसुरि सम्पद वाला है, उस परमात्मा से द्वेष करने वाला है, जबकि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि तू दैवी सम्पद को प्राप्त हुआ है, शोक मत कर। यहाँ भी स्पष्ट हुआ कि ईश्वर का निवास सबके ह्रदय देश में है स्मरण रखना चहिये कि तुम्हे सतत देख रहा है। अत: सदैव शास्त्रनिर्दिष्ट क्रिया ही आचरण करना चहिये अन्यथा दण्ड प्रस्तुत है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पुन: स्वयं कहा कि आसुरी स्वभाव वाले क्रूर मनुष्यों को मैं बारम्बार नरक में गिरता हूँ। नरक का स्वरूप क्या है? तो बताया, बारम्बार नीच-अधम योनियों में गिरना एक दुसरे का पर्याय है। यही नरक का स्वरुप है। काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन मूल द्वार है। इन तीनो पर ही उस कर्म का आरम्भ होता है। जिसे मैंने बार-बार बताया है। सिद्ध है कि कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जिसका आरम्भ काम, क्रोध और लोभ को त्याग देने पर ही होता है। सांसारिक कार्यो में, मर्यादित ढंग से सामजिक व्यवस्थाओं का निर्वाह करने में भी जो जितने व्यस्त है काम, क्रोध और लोभ उनके पास उतने अधिक सजे-सजाये मिलते है। वस्तुत: इन तीनो के त्याग देने पर ही परम में प्रवेश दिलाने वाले निर्धारित कर्म में प्रवेश मिलता है। इसलिए मैं क्या करूँ, क्या न करूँ? इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था मैं शास्त्र ही प्रमाण है। कौन-सा शास्त्र? यही गीताशास्त्र ‘किमन्यै शास्त्रविस्तरै:।’ इसलिये इस शास्त्र द्वारा निर्धारित किये हुये कर्म विशेष (यज्ञार्थ कर्म) को ही तू कर। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी दोनो सम्पदाओं का विस्तार से वर्णन किया। उनका स्थान मानव ह्रदय बताया। उनका फल बताया। अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “दैवासुर सम्पद् विभाग योग” नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-1733 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-15 (Part-15) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-15 (Part-15) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १५ सारांश / निष्कर्ष :- पुरुषोत्तम योग इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि संसार एक वृक्ष है, पीपल जैसा वृक्ष है। पीपल एक उदहारण मात्र है। ऊपर इसका मूल परमात्मा और नीचे प्रकृतिपर्यन्त इसकी शाखा-प्रशाखाएँ है। जो इस वृक्ष को मूल सहित विदित कर देता है, वह वेदों का ज्ञाता है। इस संसार वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे सर्वत्र व्याप्त है और मूलानि – उसकी जड़ो का जाल भी ऊपर और नीचे सर्वत्र व्याप्त है, क्योकि वह मूल ईश्वर और वही बीज रूप से प्रत्येक जीव ह्र्दय में निवास करता है। पौराणिक आख्यान है कि एक बार कमल के आसन बैठे हुए ब्रह्माजी ने विचार किया कि मेरा उद्‌गम क्या है? जहाँ से वे पैदा हुए थे, उस कमल नाल में प्रवेश करते चले गये। अनवरत चलते रहे, किन्तु अपना उद्‌गम न देख सके। तब हताश होकर वे उसी कमल के आसन पर बैठ गये। चित का निरोध करने में लग गये और ध्यान के द्वारा उन्होंने अपना मूल उद्‌गम पा लिया, परमतत्व का साक्षात्कार किया, स्तुति की। परम स्वरूप से ही आदेश मिला कि मैं हूँ तो सर्वत्र, किन्तु मेरी प्राप्ति का स्थान मात्र ह्रदय है। ह्रदय देश में जो ध्यान करता है वह मुझे प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मा एक प्रतिक है। योग साधना की एक परिपक अवस्था में इस स्थिति की जाग्रति है। ईश्वर की और उन्मुख ब्रह्मविद्या से सयुक्त बुद्धि ही ब्रह्मा है। कमल पानी में रहते हुए भी निर्मल और निर्लेप रहता है। बुद्धि जब तक इधर-उधर ढूँढ़ती है, तब तक नहीं पाती और जब वही बुद्धि निर्मलता के आसन पर आसीन होकर मन सहित इन्द्रियो को समेटकर ह्रदय देश में निरोध कर लेती है, उस निरोध के भी विलीनीकरण की अवस्था में अपने ही ह्रदय में परमात्मा को पा लेती है। यहाँ भी योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार संसार वृक्ष है, जिसका मूल सर्वत्र है और शाखाएँ सर्वत्र ‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’कर्मो के अनुसार केवल मनुष्य-योनि मैं बंधन तैयार है, बाँधता है। अन्य योनिया तो इन्ही कर्मो के अनुसार भोग भोगती है। अत: दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र द्वारा इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को तू काट और उस परमपद को ढूँढ़, जिसमें गये हुए महर्षि पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते। कैसे जाना जाय कि संसार वृक्ष कट गया? योगेश्वर कहते है कि जो मान और मोह से सर्वथा रहित है, जिसने संगदोष जीत लिया है, जिसकी कामनाएँ निवृत्त हो गयी हो गई है और जो द्वंद्व से मुक्त है, वह पुरुष उस परमतत्व को प्राप्त होता है। उस परमपद को न सूर्य, न चंद्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर पाते है, वह स्वयं प्रकाश रूप है। जिसमें गये हुये पीछे लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है, जिसे पाने का अधिकार सबको है, क्योकि यह जीवात्मा मेरा ही शुद्ध अंश है। शरीर का त्याग करते समय जीवात्मा मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के कार्यकलापों को लेकर नये शरीर को धारण करता है। संस्कार सात्त्विक है तो सात्त्विक स्तर पर पहुचं जाता है, राजसी है तो मध्यम स्थान पर और तामसी रहने पर जघन्य योनियों तक पहुचं जाता है तथा इन्द्रियों के अधिष्ठाता मन के माध्यम से विषयो को देखता और भोगता है। यह दिखायी नहीं पढता, इसे देखने की दृष्टि ज्ञान है। कुछ याद कर लेने का नाम ज्ञान नहीं है। योगीजन ह्रदय में चित्त को समेटकर प्रयत्न करते हुए ही उसे देख पाते है, अत: ज्ञान साधनगम्य है। हाँ, अध्ययन से उसके प्रति रुझान उत्पन्न होती है। संशययुक्त, अकृतात्मा लोग प्रयत्न करते हुये भी उसे नहीं देख पाते। यहाँ प्राप्ति वाले स्थान के चित्रण है। अत: उस अवस्था की विभूतियों का प्रभाव स्वाभाविक है। उन पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहते है कि सूर्य और चंद्रमा में मैं ही प्रकाश हूँ अग्नि में मैं ही तेज हूँ, मैं ही प्रचण्ड अग्निरूप से चार विधियों से परिपक्व होने वाले अन्न को पचाता हूँ। श्री कृष्ण के शब्दों में अन्न एक मात्र ब्रह्म है। ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’(तैत्तिरीय उपनिषद्, भृगुबल्ली २) जिसे प्राप्त कर यह आत्मा तृप्त हो जाती है। बैखरी से परापर्यन्त अन्न पूर्ण परिपक्व होकर पच जाता है, वह पात्र भी खो जाता है। इस अन्न को मैं ही पचाता हूँ अर्थात् सद्गुरु जब तक रथी न हो, तब तक ये उपलब्धि नही होती।
2021-01-1632 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-14 (Part-14) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-14 (Part-14) in Hindi Podcast प्रक्रति से ही उत्पन्न हुए रज, सत्त्व और तम तीनो गुण ही इस जीवात्मा को शरीर में बांधते है। दो गुणों को दवाकर तीसरा गुण बढाया जा सकता है। गुण परिवर्तनशील है। प्रक्रति जो अनादि है, नष्ट नहीं होती, बल्कि गुणों का प्रभाव टाला जा सकता है गुण मन पर प्रभाव डालते है। जब सत्त्वगुण की वृद्धि रहती है तो ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति रहती है। रजोगुण रागत्मक है। उस समय कर्म का लाभ रहता है, आसक्ति रहती है और अन्त:करण में तमोगुण कार्य रूप लेने पर आलस्य – प्रमोद घेर लेता है। सत्त्व की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त पुरुष ऊपर के निर्मल लोको में जन्म लेता है। रजोगुण के वृद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य मानव योनी में ही लोटकर आता है और तमोगुण की वृद्धिकाल में मनुष्य शरीर त्यागकर अधम ( पशु, कीट, पतगं इत्यादि ) योनी को प्राप्त होता है। इसलिये मनुष्यों को क्रमशः उत्पन्न गुण सात्त्विक की ओर ही बढ़ाना चाहिये। वे जिससे मुक्त होते है, उसका स्वरूप बताते हुये योगेश्वर ने कहा- अष्टधा मूल प्रक्रति गर्भ को धारण करने वाली माता है और मैं ही बीज रूप पिता हूँ। अन्य न कोई माता है, न पिता। जब तक ये क्रम रहेगा, तब तक चारचर जगत में निमित रूप से कोई न कोई माता पिता बनते रहंगे, किन्तु वस्तुत: प्रकृति ही माता है, मैं ही पिता हूँ। अर्जुन ने तीन प्रश्न किये- गुनातीत पुरुष के किया लक्षण है? क्या आचरण है? और किस उपाय से मनुष्य इन तीनो गुणों से अतीत होता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गुणातीत पुरुष के लक्षण और आचरण बताये और अन्त में गुणातीत होने का उपाय बताया कि जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति और योग के द्वारा निरन्तर मुझे भजता है वह तीनो गुणों से अतीत हो जाता है।अन्य किसी का चिन्तन न करते हुये निरन्तर इष्ट का चिन्तन करना अव्यभिचारिणी भक्ति है। जो संसार के संयोग-वियोग से सर्वथा रहित है, उसी का नाम योग है। उनको कार्य रूप देने के प्रणाली का नाम कर्म है यज्ञ जिससे सम्पन होता है, वह हरकत कर्म है। अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा उस नियत कर्म के आचरण से ही पुरुष तीनो गुणों से अतीत होता है और अतीत होकर ब्रह्म के साथ एकीभाव के लिए, पूर्ण कल्प को प्राप्त होने के लिए योग्य होता है। गुण जिस मन पर प्रभाव डालते है, उसके विलय होते ही ब्रह्म के साथ एकीभाव हो जाता है, यही वास्तविक कल्प है। अत: बिना भजन किये कोई गुणों से अतीत नहीं होता। अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण निर्णय देते है- वह गुणातीत पुरुष जिस ब्रह्म के साथ एकीभाव में स्थित होता है उस ब्रह्म का, अमृत तत्व का, शाश्वतधर्म का और अखण्ड एकरस आनंद का मैं ही आश्रय हूँ अथार्त प्रधान कर्ता हूँ। अब तो श्रीकृष्ण चले गये, अब वह आश्रय तो चला गया, तब तो बढे संशय की बात है। वह आश्रम अब कहाँ मिलेगा? लेकिन नहीं, श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया है कि वे एक योगी थे, ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।’ अर्जुन ने कहा- मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे सँभालिये। स्थान-स्थान पर श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया, स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताये और उनसे अपनी तुलना की। अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण एक महात्मा, योगी थे। अब यदि आपको अखण्ड एकरस आनन्द शाश्वत-धर्म अथवा अमृत तत्व की आवश्यकता है तो इन सबकी प्राप्ति की स्त्रोत एकमात्र सदगुरु है। सीधे पुस्तक पढ़कर इसे कोई नहीं पा सकता। जब वही महापुरुष आत्मा से अभिन्न होकर रथी हो जाते है, तो शनै:-शनै: अनुरागी को संचालित करते हुये उसके स्वरूप तक, जिनमे वे स्वयं प्रतिष्ठित है, पहुँचा देते है। वही एक मात्र माध्यम है। इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने को सबका आश्रय बताते हुये इस चौदहवें अध्याय का समापन किया, जिसमें गुणों का विस्तार से वर्णन है। अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “गुणत्रय विभाग योग” नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-1532 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-13 (Part-13) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-13 (Part-13) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १३ सारांश / निष्कर्ष :- क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग गीता के आरम्भ में धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र का नाम तो लिया गया, किन्तु वह क्षेत्र वस्तुत: है कहा? वह स्थल बताना शेष था, जिसे स्वयं शास्त्रकार ने प्रस्तुत अध्याय में स्पष्ट किया। कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र है। जो इसको जनता है, वह क्षेत्रज्ञ है। वह इसमें फँसा नहीं बल्कि निर्लेप है। इसका संचालक है। ” अर्जुन! सम्पूर्ण क्षेत्रों में मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ। ” अन्य महापुरुषो से अपनी तुलना की। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण भी एक योगी थे क्योकि जो जनता है वह क्षेत्रज्ञ है, ऐसा महापुरुषो ने कहा है। मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ अथार्त अन्य महापुरुषों की तरह मैं भी हूँ। उन्होंने क्षेत्र जैसा है, जिन विकारो वाला है तथा क्षेत्रज्ञ जिन प्रभावों वाला है, उस पर प्रकाश डाला। मैं ही कहता हूँ ऐसी बात नहीं, महर्षियों ने भी यही कहा है। वेद के छन्दों में भी उसी को विभाजित करके दर्शाया गया है। ब्रह्मसूत्र में भी वही मिलता है। शरीर ( जो क्षेत्र ) है क्या इतना ही है, जितना दिखयी देता है? इसके होने के पीछे जिसका बहुत बड़ा हाथ है, उन्हें गिनाते हुये बताया कि अष्टधा मूल प्रक्रति, अव्यक्त प्रक्रति, दस इन्द्रियाँ और मन, इन्द्रियाँ के पांचो विषय, आशा, तृष्णा और वासना – इस प्रकार इन विकारो का सामूहिक मिश्रण यह शरीर है। जब तक ये रहेंगे, तब तक ये शरीर किसी न किसी रूप में रहेगा ही। यह ही क्षेत्र है जिसमें बोया भला बुरा बीज संस्कार रूप में उगता है। जो इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है। क्षेत्रज्ञ का स्वरूप बताते हुये उन्होंने ईश्वरीय गुणधर्मों पर प्रकाश डाला और कहा कि क्षेत्रज्ञ इस क्षेत्र का प्रकाशक है। उन्होंने बताया की साधना के पूर्तिकाल में परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ है साक्षात्कार। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, अज्ञान है। जानने योग्य वस्तु है परात्पर ब्रह्म। वह न सत है न असत- इन दोनों से परे है। उसे जानने के लिये लोग ह्र्दय में ध्यान करते है, बाहर मूर्ति रखकर नहीं। बहुत से लोग सांख्य-माध्यम से ध्यान करते है, शेष निष्काम कर्मयोग, सम्पूर्ण के साथ उसकी प्राप्ति के लिये उसी निर्धारित कर्म आरधना का आचरण करते है। वे भी परम कल्याण को प्राप्त हो जाते है अत: कुछ भी समझ न आये तो उसके ज्ञाता महापुरुष का सत्संग आवश्यक है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- जैसे आकाश सर्वत्र सम रहता हुआ भी निर्लेप है, जैसे सूर्य सर्वत्र प्रकाश करते हुये भी निर्लेप है, ठीक उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ, पुरुष सर्वत्र सम ईश्वर को जैसा है वेसा ही देखने की क्षमता वाला पुरुष क्षेत्र से अथवा प्रक्रति से सर्वथा निर्लेप है। अन्त में उन्होंने निर्णय दिया कि क्षमता वाला पुरुष क्षेत्र से अथवा प्रक्रति से सर्वथा निर्लेप है। अन्त में उन्होंने निर्णय दिया कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की जानकारी ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा ही सम्भव है। ज्ञान जैसा की पीछे बताया गया, उस परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ मिलने वाली जानकारी है। शास्त्रों को बहुत रटकर दुहराना ज्ञान नहीं बल्कि अध्ययन तथा महापुरुषों से उस कर्म को समझकर, उस कर्म पर चलकर मनसहित इन्द्रियों के निरोध और उस निरोध के भी विलयकाल में परमतत्व को देखने के साथ जो अनुभूति होती है, उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है। क्रिया आवश्यक है। इस अध्याय में मुख्यत: क्षेत्रज्ञ का विस्तार से वर्णन किया गया है। वस्तुत क्षेत्र का स्वरूप व्यापक है। शरीर कहना तो सरल है किन्तु शरीर का सम्बन्ध कहाँ तक है? तो समग्र ब्रह्माण्ड मूल प्रक्रति का विस्तार है। अनन्त अन्तरिक्षों तक आपके शरीर का विस्तार है। उनसे आप का जीवन ऊर्जस्वी है, उनके विना आप जी नहीं सकते। यह भूमंडल, विश्व, जगत, देश, प्रदेश और आपका यह दिखाई देने वाला शरीर उस प्रकर्ति का एक टुकड़ा भी नहीं है। इस प्रकार क्षेत्र का ही इस अध्याय में विस्तार से वर्णन है अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ” क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग ” नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-1442 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-12 (Part-12) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-12 (Part-12) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १२ सारांश / निष्कर्ष :- भक्तियोग गत अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- अर्जुन! तेरे सिवाय न कोई पाया है, न कोई पा सकेगा। जैसा तू ने देखा, किन्तु अनन्य भक्ति अथवा अनुराग से जो भजता है, वह इसी प्रकार मुझे देख सकता है, तत्व के साथ मुझे जान सकता है और मुझमें प्रवेश भी पा सकता है। अथार्त परमात्मा ऐसी सत्ता है, जिसको पाया जाता है। अत: अर्जुन भक्त बन। अर्जुन ने इस अध्याय में प्रश्न किया कि- भगवन! अनन्य भाव से जो आपका चिन्तन करते है और दुसरे वे जो अक्षर अव्यक्त की उपासन करते है, इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि दोनों मुझे ही प्राप्त होते है क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ। किन्तु जो इन्द्रियों को वश में रखते हुये मन को सब ओर से समेटकर अव्यक्त परमात्मा में आसक्त है, उनके पथ में कलेश विशेष है। जब तक देह का अध्यास (भान) है, तब तक अव्यक्त स्वरूप की प्राप्ति दु:खपूर्ण है, क्योकि अव्यक्त स्वरूप तो चित्त के निरोध और विलयकाल में मिलेगा। उसके पूर्व उसका शरीर ही बीच में बाधक बन जाता है। मैं हूँ, मैं हूँ, मुझे पाना है- कहते है अपने शरीर की ओर घूम जाता है। उसके लड़खड़ाने की अधिक सम्भावना है। अत: अर्जुन! तू सम्पूर्ण कर्मो को मुझमें अर्पण करके मानव शरीरधारी मुझ सगुण योगी के रूप का ध्यान द्वारा तैलधारावत् निरन्तर चिन्तन करते है, उनका मैं शीघ्र संसार – सागर से उद्धार करने वाले हो जाता हूँ। अत: भक्तिमार्ग श्रेष्ठ है। अर्जुन! मुझमें मन को लगा। मन न लगे तो भी लगाने का अभ्यास कर। जहाँ भी चित जाय, पुनः घसीटकर उसका निरोध कर। यह भी करने में असमर्थ है तो तू कर्म कर। कर्म एक ही है, यज्ञार्थ कर्म। तू कार्यम् कर्म करता भर जा, दूसरा न कर। उतना ही कर, पार लगे चाहे न लगे। यदि यह भी करने में असमर्थ है तो स्थितप्रज्ञ, आत्मवान्, तत्त्वज्ञ महापुरुष की शरण होकर सम्पूर्ण कर्मफलो का त्याग कर। ऐसा त्याग करने से तू परमशान्ति को प्राप्त हो जायेगा। तत्पश्चात् परमशान्ति को प्राप्त हुये भक्त के लक्षण बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- जो समूर्ण भूतो में द्वेषभाव से रहित है, जो करुणा से युक्त और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जो ध्यान योग में निरन्तर तत्पर और आत्मवान्, आत्मस्थित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जिससे न किसी को उद्वेग प्राप्त होता है और स्वयं भी जो किसी से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। शुद्ध है, दक्ष है, व्यथाओं से उपराम है, सर्वारम्भों को त्यागकर जिसने पार पा लिया है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागी और शुभाशुभों का पार पाने वाला भक्त मुझे प्रिय है। जो निंदा और स्तुति में समान और मोंन है, मनसहित जिनकी इन्द्रियाँ शान्त और मौन है, जो किसी भी प्रकार शरीर-निर्वाह में संतुष्ट और रहने के स्थान में ममता से रहित है, शरीर-रक्षा में भी जिनकी आसक्ति नहीं है, ऐसा स्थितप्रज्ञ पुरुष मुझे प्रिय है।
2021-01-1326 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-11 (Part-11) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-11 (Part-11) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ११ सारांश / निष्कर्ष :- विश्वरूप-दर्शन योग इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा – भगवन! आपकी विभूतियों को मैंने विस्तार से सुना, जिससे मेरा मोह नष्ट हो गया, अज्ञान का शमन हो गया, किन्तु जैसा आपने बताया कि मैं सर्वत्र हूँ, इसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। यदि मेरे द्वारा देखना संभव हो, तो कृपया उसी रूप को दिखाइये। अर्जुन प्रिय सखा था, अनन्य सेवक था अतएव योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कोई प्रतिवाद न कर तुरन्त दिखाना प्रारम्भ किया कि अब मेरे ही अन्दर खड़े सप्तऋषि और उनसे भी पूर्व होने वाले ऋषियों को देख, सर्वत्र फेले मेरे तेज को देख, मेरे ही शरीर में एक स्थान पर खड़े तू चराचर जगत को देख, किन्तु अर्जुन ऑंखें ही मलता रह गया। इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों तक अनवरत दिखाते गयें, किन्तु अर्जुन को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा। सभी विभूतिया योगेश्वर में उस समय थी, किन्तु अर्जुन को वे समान्य मनुष्य जैसे ही दिखायी पड़ रहे थे। तब इस प्रकार दिखाते – दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण सहसा रुक जाते है और कहते है – अर्जुन! इन आँखों से तू मुझे नहीं देख सकता। अपनी बुद्धि से तू मुझे परख नहीं सकता। लो, अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मुझे देख सकेगा। भगवान तो सामने खड़े ही थे। अर्जुन ने देखा, वास्तव में देखा। देखने के पश्चात क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमायाचना करने लगा, जो वास्तव में त्रुटियाँ नहीं थी। उदाहरण के लिए, भगवान! कभी मैंने आपको कृष्ण, यादव और सखा कह दिया था, इसके लिए आप मुझे क्षमा करे। श्रीकृष्ण ने क्षमा भी किया, क्योकि अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार कर वे सौम्य स्वरूप मैं आ गये, धीरज बँधाया। वस्तुतः कृष्ण कहना अपराध नहीं था। वे सावलें थे ही, गोर कैसे कहलाते। यदुवंश में जन्म हुआ ही था। श्रीकृष्ण स्वयं भी अपने को सखा मानते थे। वास्तव में प्रत्येक साधक महापुरुष को पहले ऐसा ही समझते है। कुछ उन्हें रूप और आकार से संबोधित करते है, कुछ उनकी वृति से उन्हें पुकारते है और कुछ उन्हें अपने ही समकक्ष मानते है, उनके यथार्थ स्वरूप को नहीं समझते है। उनके अचिंत्य स्वरूप को अर्जुन ने समझा तो पाया कि ये न तो काले है और न गोरे, न किसी कुल के है और न किसी के साथी है। इनके सामान कोई है ही नहीं, तो सखा कैसा? बराबर कैसा? यह तो अचिंत्य स्वरूप है। जिसे वह स्वयं दिखा दे वह देख पता है। अत: अर्जुन ने अपनी प्रारंभिक भूल के लिये क्षमायाचना की। प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण कहना अपराध है तो उनका नाम जपा कैसे जाय? तो जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जपने के लिये स्वयं बल दिया जपने की हो विधि बताई, उसी विधि से आप चिन्तन-स्मरण करें। वह है – “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।” ओम अक्षय ब्रह्म का पर्याय है। “ओ अहम् स ओम्” जो व्याप्त है वह सत्ता मुझमें छिपी है, यही है ओम का आशय। आप इसका जप करे और मेरा ध्यान करे। रूप अपना, नाम ओम का बताया। अर्जुन ने प्रार्थना की कि चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिये। श्रीकृष्ण ने उसी सोम्य स्वरूप को धारण किया। अर्जुन ने कहा – भगवन! आपके इस सोम्य मानव स्वरूप को देखकर अब मैं प्रकृतिस्थ हुआ। माँगा था चतुर्भुज रूप, दिखाया “मानुषं रूपं”। वास्तव में शाश्वत में प्रवेश वाला योगी शरीर से यहाँ बैठा है, बहार दो हाथो से कार्य करता है और साथ ही अंतरात्मा से जाग्रत होकर प्रेरक के रूप में कार्य करता है। हाथ उसके कार्य का प्रतिक है, यही चतुर्भुज है। श्रीकृष्ण ने कहा – अर्जुन! तेरे सिवाय मेरे इस रूप को न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। तब गीता तो हमारे लिये व्यर्थ है। किन्तु नहीं, योगेश्वर कहते है एक अपाय है। जो मेरा अनन्य भक्त है, मेरे सिवाय जो दुसरे किसी का स्मरण न करके निरन्तर मेरा ही चिन्तन करने वाला है, उनकी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने को ( जैसा तूने देखा है ), तत्व से जानने को और प्रवेश करने को भी सुलभ हूँ। अथार्त अर्जुन अनन्य भक्त था। भक्ति का परिमार्जित रूप है अनुराग, इष्ट के अनुरूप लगाव। ” मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। ” अनुरागविहीन पुरुष न कभी पाया है और न पा सकेगा। अनुराग नहीं है तो कोई लाख योग करे, जप करे, तप करे या दान करे वह नहीं मिलता। अत: इष्ट के अनुरूप राग अथवा भक्ति नितान्त आवश्यक है।
2021-01-121h 16Devotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-10 (Part-10) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-10 (Part-10) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १० सारांश / निष्कर्ष :- विभूति-वर्णन इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा कि – अर्जुन! मैं तुझे पुनः उपदेश करूँगा, क्योकि तू मेरा अतिशय प्रिय है। पहले कह चुके है, फिर भी कहने जा रहे है, क्योकि पूर्तिपर्यन्त सदगुरु से सुनने की आवश्यकता रहती है। मेरी उत्पति को न देवता और न महर्षिगण ही जानते है क्योकि मैं उनका भी आदि कारण हूँ। अव्यक्त स्थिति के पश्चात की सार्वभौम अवस्था को वही जनता है, जो हो चुका है। जो मुझे अजन्मा, अनादी और सम्पूर्ण लोको के महान ईश्वर को साक्षात्कारसहित जानता है वही ज्ञानी है। बुद्धि, ज्ञान, असंमूढ़ता, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, सन्तोष, तप, दान और कीर्ति के भाव अथार्त देवी संपद् के उक्त लक्षण मेरी देन है। सात महर्षिजन अथार्त योग की सात भूमिकाएँ, उससे भी पहले होने वाले तदनुरूप अन्त:करण चतुष्टय और इनके अनुकूल मन जो स्वयंभू है, स्वयं रचयिता है ये सब मुझमें भाव वाले है, लगाव और श्रद्धावाले है, जिंनकी संसार में सम्पूर्ण प्रजा है, ये सब मुझ से ही उत्पन्न है अर्थात् साधनामयी प्रवार्तिया मेरी ही प्रजा है। इनकी उत्पति अपने से नहीं, गुरु से होती है। जो उपर्युक्त मेरी विभूतियों को साक्षात् जान लेता है, वह नि:सन्देह मुझमें एकीभाव से प्रवेश करने के योग्य है। अर्जुन! मैं ही सबकी उत्पति का कारण हूँ- ऐसा जो श्रद्धा से जान लेते है वे अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते है, निरन्तर मुझमें मन, बुद्धि और प्राणों से लगने वाले होते है, आपस में मेरा गुण चिन्तन और मुझमें रमण करते है। उन निरन्तर मुझसे सयुक्त हुए पुरुषो को मैं योग में प्रवेश करने वाली बुद्धि प्रदान करता हूँ। यह मेरी ही देन है। इस प्रकार बुद्धियोग देते है तो अर्जुन! “आत्मभावस्थ” उनकी आत्मा में जाग्रत होकर खडा हो जाता हूँ और उनके ह्र्दय में अज्ञान से उत्पन अंधकार को ज्ञानरुपी दीपक से नष्ट करता हूँ। अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन! आप परम पवित्र, सनातन, दिव्य, अनाधि और सर्वत्र व्याप्त है- ऐसा महर्षिगण कहते है तथा वर्तमान में देवर्षि नारद, देवल, व्यास और आप भी वही कहते है। यह सत्य भी है कि आप को न देवता जानते है न दानव , स्वयं आप जिसे जाना दे वही जान पाता है। आप ही अपनी विभूतियों को विस्तार से कहने में समर्थ है। अत: जनार्दन! आप अपनी विभूतियों को विस्तार से कहिये। पूर्तिपर्यन्त इष्ट से सुनते रहने की उत्कंठा बनी रहनी चाहिये। आगे इष्ट के अन्तराल में क्या है, उसे साधक क्या जाने। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक-एक करके अपनी प्रमुख विभूतियों का लक्षण संक्षेप में बताया – जिनमें से कुछ योग साधन में प्रवेश करने के साथ मिलने वाली अंतरग विभूतियों चित्रण है और शेष कुछ समाज में ऋद्धियों-सिद्धियों के साथ पाई जाने वाली विभूतियों पर प्रकाश डाला और अन्त में उन्होंने बल देकर कहा – अर्जुन! बहुत कुछ जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? इस संसार में जो कुछ भी तेज और ऐश्वर्ययुक्त वस्तुएं है, वह सब मेरे तेज के अंश मात्र में स्थित है। वस्तुत: मेरी विभूतियाँ अपार है। ऐसा कहते हुये योगेश्वर ने इस अध्याय का पटाक्षेप किया। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों की मात्र बौद्धिक जानकारी दी, जिससे अर्जुन की श्रद्धा ओर से सिमटकर एक इष्ट में लग जाये। किन्तु बन्धुओं! सब कुछ सुनलेने और बाल की खाल निकालकर समझ लेने के बाद भी चलकर उसे जानना शेष ही रहता है यह क्रियात्मक पथ है। सम्पूर्ण अध्याय में योगेश्वर की विभूतियों का ही वर्णन है। अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “विभूति-वर्णन” नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-1152 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-09 (Part-09) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-09 (Part-09) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ९ सारांश / निष्कर्ष :- राजविद्या-जागृति इस अध्याय के आरम्भ मै श्रीकृष्ण ने कहा – अर्जुन! तुझ दोषरहित भक्त के लिये मैं इस ज्ञान को विज्ञानं सहित कहूँगा, जिसे जानकर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। इसे जानकर तू संसार बंधन से छुट जायेगा। यह ज्ञान सम्पूर्ण विधियाओ का राजा है विद्या वह है जो परमब्रह्म में प्रवेश दिलाये। यह ज्ञान उसका भी राजा है अथार्त निश्चय ही कल्याण करने वाला है। यह सम्पूर्ण गोपनीयों का भी राजा है, गोपनीय वस्तु को भी प्रत्यक्ष करने वाला है। यह प्रत्यक्ष फलवाला, साधन करने मै सुगम और अविनाशी है। इसका थोडा साधन आप को पार लगा जाये तो इसका कभी नाश नहीं होता वरन इसके प्रभाव से वह परमश्रेय तक पहुचं जाता है, किन्तु इसमें एक शर्त है। श्रद्धाविहीन पुरुष परमगति को न प्राप्त होकर संसार-चक्र में भटकता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग के ऐश्वर्य पर भी प्रकाश डाला। दुःख के सयोग का वियोग ही योग है अथार्त जो संसार के संयोग वियोग से सर्वथा रहित है। उसका नाम योग है। परमतत्व परमात्मा के मिलने का नाम योग है परमात्मा की प्राप्ति ही योग की पराकाष्ठा है। जो इसमें प्रवेश पा गया, उस योगी के प्रभाव को देख कि सम्पूर्ण भूतो का स्वामी और जीवधारियों का पोषण करने वाला होने पर भी मेरा आत्मा उन भूतो में स्थित नहीं है। आत्मस्वरूप में स्थित हूँ। वही हूँ। जैसे आकाश से उत्पन सर्वत्र विचरने वाला वायु आकाश में ही स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता उसी प्रकार सम्पूर्ण भुत मुझमें स्थित है लेकिन में उनमे लीन नहीं हूँ। अर्जुन कल्प के अदि में मैं भूतो को विशेष प्रकार से रचता हूँ, सजाता हूँ और कल्प के पूर्तिकाल में सम्पूर्ण भुत मेरी प्रकर्ति को अथार्त योगरूढ़ महापुरुष की रहनी को, उनके अव्यक्त भाव को प्राप्त होते है। यद्यपि महापुरुष प्रकर्ति से परे है, किन्तु प्राप्ति के पश्चात स्वभाव अथार्त स्वयं में स्थित रहते हुये लोक संग्रह के लिये जो कार्य करता है वह उसकी एक रहनी है। इसी रहनी के कार्य कलाप को उस महापुरुष की प्रकर्ति कहकर संबोधित किया गया है। एक रचयिता तो में हूँ, भूतो को कल्प के लिए प्रेरित करता हूँ और दूसरी रचयिता त्रिगुणमयी प्रकर्ति है, जो मेरे अध्याय से चाराचर सहित भूतो को रचती है। यह भी एक कल्प है। जिसमें शरीर परिवर्तन और काल परिवर्तन निहित है तुलसीदास भी यही कहते है एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकुपा।। प्रकर्ति के दो भेद विधा और अविधा है। इनमें अविधा दुष्ट है, दुख रूप है जिससे विवश जीव भवकूप में पड़ा है, जिससे प्ररित होकर जीव काल, कर्म, स्वभाव और गूढ़ के घेरे में आ जाता है। दूसरी है विधामाया, जिसे श्रीकृष्ण कहते है की मैं रचता हूँ। गोस्वामी जी के अनुसार प्रभु रचते है। एक रचइ जग गुन बस जाके। प्रभु प्ररित नहि निज बल ताकें।। यह जगत की रचना करती है, जिनके आश्रित गुण है। कल्याणकारी गुण एकमात्र ईश्वर में है प्रकर्ति में गुण है ही नहीं, वह तो नश्वर है लेकिन बिद्या में प्रभु ही प्ररक बनकर करते है। इस प्रकार कल्प दो प्रकार के है। एक तो वस्तु का, शरीर और काल का परिवर्तन कल्प यह परिवर्तन प्रकर्ति ही मेरे आभास से करती है। किन्तु इसमें महान कल्प जो आत्मा को निर्मल स्वरूप प्रदान करता है, उसका शृंगार महापुरुष करते है। वे अचेत भूतो को सचेत करते है भजन का आदि हि इस कल्प का आरम्भ है और भजन की पराकाष्ठा कल्प का अन्त है। जब यह कल्प भवरोग से पूर्ण निरोग वनाकर शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश ( स्थिति ) दिला देता है, प्रवेश काल में योगी मेरी रहनी और मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। के पश्चात महापुरुष की रहनी ही उसकी प्रकर्ति है।
2021-01-1054 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-08 (Part-08) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-08 (Part-08) in Hindi Podcast जिससे जीव माया के आधिपत्य से निकल कर आत्मा के आधिपत्य में होजाता है वही अध्यात्म है। और भूतो के वह भाव जो शुभ अथवा अशुभ संस्कारो को उत्पन करते है। उन भावो का रुक जाना विसर्ग – मिट जाना ही कर्म की सम्पूर्णता है। इसके आगे कर्म करने कि आवश्यकता नहीं रह जाती। अत: कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो संस्कारो के उद्‌गम को ही मिटा देता है। इसी प्रकार क्षरभाव अधिभूत है अथार्त नष्ट होने वाले ही भूतो को उत्पन करने मे माध्यम है। वे ही भूतो के अधिष्ठाता है। परमपुरष ही अधिदैव है। उसमें देव्य सम्पद विलीन होती है इस शरीर में अधियज्ञ मैं ही हूँ अथार्त जिसमे यज्ञ विलय होते है वह मैं हूँ यज्ञ का अधिष्ठाता हूँ। वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त होता है अथार्त श्रीकृष्ण एक योगी थे। अधियज्ञ कोई ऐसा पुरुष है जो इस शरीरि में रहता है बाहर नहीं। अन्तिम प्रश्न समय में आप किस प्रकार जानने में आते है? उन्होंने वताया की जो मेरा निरंतर स्मरण करते है, मेरे सिवाय किसी दुसरे विषय-वस्तु का चिन्तन नहीं आने देते और ऐसा करते हुए शरीर का सम्बन्ध त्याग देते है वे मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होते है जिसे अन्त में वहीं प्राप्त रहता है। शरीर की मृत्यु के साथ यह उपलव्धि होती हो ऐसी बात नहीं है। मरने पर ही मिलता तो श्रीकृष्ण पूर्ण न होते, अनेको जन्मो में चलकर पानेवाला ज्ञानी उनका स्वरूप न होता। मन का सर्वथा निरोध और निरुद्ध मन का भी विलय ही अन्तकाल है, जहाँ फिर शरीर की उत्पति का माध्यम शांत हो जाता है। उस समय वह परमभाव में प्रवेश पा जाता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता। इस प्राप्ति के लिए उन्होंने स्मरण का विधान वताया – अर्जुन! निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध कर। दोनों एक साथ कैसे होंगे? कदाचित ऐसा हो कि जय गोपाल, हे कृष्णा कहते रहे, लाठी भी चालते रहे। स्मरण का स्वरूप स्पष्ट किया कि योग धारण में स्थिर रहते हुए, मेरे सिवाय अन्य किसी की वास्तु का स्मरण न करते हुए निरन्तर स्मरण कर जब स्मरण इतना सूक्ष्म है तो युद्ध कोन करेगा? मान लीजिये, यह पुस्तक भगवान है, तो अगल बगल की वस्तु, सामने बेठे हुये लोग या अन्य देखी सुनी कोई वस्तु संकल्प में भी ना आये, दिखाई न पड़े। यदि दिखाई पड़ती है तो स्मरण नहीं है। ऐसे स्मरण में युद्ध कैसा? वस्तुत: जब आप इस प्रकार निरंतर स्मरण में प्रवृत्त होंगे, तो उसी क्षण युद्ध का सही स्वरूप खड़ा होता है। उस समय मायिक प्रवार्तिया बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही है। काम, क्रोध, राग, द्वेष दुर्जय शत्रु है। ये शत्रु स्मरण करने नहीं देंगे। इनसे पार पाना ही युद्ध है इस शत्रुओं के मीट जाने पर ही व्यक्ति परमगति को प्राप्त होता है। इस परम गति को पाने के लिए अर्जुन! तू जप तो ॐ का और ध्यान मेरा कर अथार्त श्रीकृष्ण एक योगी थे। नाम और रूप आराधना की कुंजी है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रश्न को भी लिया की पुनर्जन्म क्या है? उसमें कोन – कोन आते है? उन्होंने बताया की ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत पुनरावर्ती है और इन सबके समाप्त होने पर भी मेरा परम अव्यक्त भाव तथा उसमें स्थिति समाप्त नहीं होती। इस योग मैं प्रविष्ट पुरुष की दो गतिया है। जो पूर्ण प्रकाश को प्राप्त षडैश्वर्यसम्पन्न ऊर्ध्वरेता है, जिसमें लेस मात्र भी कमी नहीं है, वह परमगति को प्राप्त होता है। यदि उस योगकर्ता में लेशमात्र भी कमी है, कृष्णपक्ष-सी कालिमा का संचार है ऐसी अवस्था में शरीर का समय समाप्त होने वाले योगी को जन्म लेना पड़ता है वह समय जीव के तरह जन्म – मरण के चक्कर में नहीं फसता बल्कि जन्म लेकर उससे आगे की शेष साधना को पूरा करता है। इस प्रकार आगे के जन्म में उसी क्रिया से चलकर वह भी वही पहुचं जाता है। जिसका नाम परमधाम है पहले भी श्रीकृष्ण कह आये है कि इसका थोडा भी साधन जन्म मरण के महान भय से उद्धार करके के छोड़ता है। दोनों रास्ते शाश्वत है, अमिट है, इस बात को समझकर कोई भी पुरुष योग से चलये मान नहीं होता। अर्जुन! तू योगी बन। योगी वेद, तप, यज्ञ और दान के पुण्यफलो का उल्लंघन कर जाता है, परमगति को प्राप्त होता है। इस अध्याय में स्थान – स्थान पर परमगति का चित्रण किया गया है जिसे अव्यक्त अक्षय और अक्षर कहकर संबोधित किया गया, जिसका कभी क्षय अथवा विनाश नहीं होता। अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “अक्षर ब्रह्मयोग” नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-0950 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-07 (Part-07) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-07 (Part-07) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ७ सारांश / निष्कर्ष :- समग्र जानकारी इस सातवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया की – अनन्य भाव से मुझमें समर्पित होकर, मेरे आश्रित होकर जो योग में लगता है वह समग्र रूप से मुझे जनता है। मुझे जानने के लिये हजारो में कोई विरला ही प्रयत्न करने वालो में विरला ही कोई जानता है। वह मुझे पिण्ड रूप में एक देशीय नहीं वरन सर्वत्र वियाप्त दिखता है। आठ भेदों वाली मेरी जड़ प्राकर्ति है और इसके अन्तराल में जीवरूप मेरी चेतन प्रकर्ति है। इन्ही दोनों के संयोग से पूरा जगत खड़ा है। तेज और बल से मेरे ही द्वारा राग और काम से रहित बल तथा कामना भी मैं ही हूँ। जैसा की सब कामनाये तो वर्जित है, लेकिन मेरी प्राप्ति के लिए कामना कर। ऐसी इच्छा का अभ्युदय होना मेरा ही प्रसाद है। केवल परमात्मा को पाने की कामना ही “धर्मानुकूल कामना” है। श्रीकृष्ण ने बताया कि – मैं तीनो गुणों में अतीत हूँ। परम का स्पर्श करके परमभाव में स्थित हूँ, किन्तु भोगासक्त मूढ़ पुरुष सीधे मुझे न भजकर अन्य देवताओ की उपासना करते है, जबकि वहा देवता नाम का कोई है ही नहीं। पत्थर, पानी, पेड़ जिनको भी पूजना चाहते है, उसी मैं उनकी श्रद्धा को मैं ही पुष्ट करता हूँ। उसकी आढ़ खड़ा होकर मैं ही फल देता हूँ, क्योकि न वहा कोई देवता है, न ही किसी देवेता के पास कोई भोग ही है। लोग मुझे कोई साधारण व्यक्ति समझकर नहीं भजते, क्योकि मैं योग प्रक्रिया द्वारा ढाका हुआ हूँ। अनुष्ठान करते – करते योगमाया का आवरण पार करने वाले ही मुझ शारीरधरी को भी अव्यक्त रूप मैं जानते है, अन्य स्थितयो में नहीं। मेरे भक्त चार प्रकार के है – अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। चिन्तन करते – करते अनेक जन्मो के अन्तिम जन्म में प्राप्ति वाला ज्ञानी मेरा ही स्वरुप है अर्थात् अनेक जन्मो से चिन्तन करके उस भगवत्स्वरूप को प्राप्त किया जाता है। राग-द्वेष के मोह से आक्रान्त मनुष्य मुझे कदापि नहीं जान सकते, किन्तु राग-द्वेष मोह से रहित होकर जो नियतकर्म ( जिसे संक्षेप आराधना कह सकते है ) का चिन्तन करते हुये जरा-मरण से छुटने के लिए प्रयत्नशील है। वे पुरुष सम्पूर्ण रूप से मुझे जान लेते है। वे सम्पूर्ण ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण अधिभूत को, सम्पूर्ण अधिदैव को, सम्पूर्ण कर्म को और सम्पूर्ण यज्ञ के सहित मुझे जानते है अर्थात् फिर कभी वे विस्मृत नहीं होते। इस अध्याय में परमात्मा की समग्र जानकारी का विवेचन है, अत: – इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “समग्र जानकारी” नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-0841 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-06 (Part-06) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-06 (Part-06) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ६ सारांश / निष्कर्ष :- अभ्यासयोग इस अध्याय के आरम्भ मे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि फल के आश्रय से रहित होकर जो “कार्यम् कर्म” अर्थात् करने योग्य प्रक्रिया-विशेष का आचरण करता है। वही सन्याशी है और उसी कर्म को करने वाला ही योगी है। केवल क्रियाओं अथवा अग्नि को त्यागनेवाला योगी अथवा सन्यासी नहीं होता। संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरुष सन्याशी अथवा योगी नहीं होता। हम संकल्प नहीं करते – ऐसा कह देने मात्र से संकल्प पिंड नहीं छोड़ते। योग में आरूढ़ होने की इच्छावाले पुरुष को चाहिए कि ‘कार्यम् कर्म’। कर्म करते – करते योगआरूढ़ हो जाने पर ही सर्वसंकल्पों का अभाव होता है, इससे पूर्व नहीं। सर्वसंकल्पों का अभाव ही सन्यास है। योगेश्वर ने पुनः बताया की आत्मा अधोगति में जाता है। और उसका उद्धार भी होता है जिस पुरुष द्वारा मनसहित इन्द्रिया जीत ली गई है उसका आत्मा उसके लिए मित्र बनकर मित्रता में बरतता है तथा परमकल्याण करने वाला होता है। जिसके द्वारा ये नहीं जीती गयी, उसके लिए उसी का आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतता है, यातनाओं का कारण बनाता है। अत: मनुष्य को चाहिये की अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचावे, अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार करे। उन्होंने प्राप्ति वाले योगी की रहनी बतायी। “यज्ञस्थली”, बैठने का आसन तथा बैठने के तरीके पर उन्होंने कहा की स्थान एकांत हो और स्वच्छ हो। वस्त्र, मृगचर्म अथवा कुश की चटाई में से कोई एक आसन हो। कर्म के अनुरूप चेष्टा, युक्ताहार-विहार, सोने – जागने के संयम पर उन्होंने बल दिया। योगी के निरुद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, उस समय वह योग की पराकाष्ठा अनन्त आनंद को प्राप्त होता है। संसार के संयोग वियोग से रहित अनन्त सुख का नाम योग है। योग का अर्थ है उससे मिलन। जो योगी इसमें प्रवेश पा जाता है, वह सम्पूर्ण भूतो में समदृष्टिवाला हो जाता है। जैसे अपनी आत्मा वैसे ही सबकी आत्मा को देकता है। वह परम पराकाष्ठा की शान्ति को प्राप्त होता है। अत: योग आवश्यक है, मन जहा जहा जाये वहां – वहां घसीटकर बारम्बार इसका निरोध करना चहिये। श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया की मन बड़ी कठिनाई से वश मे होने वाला है, लेकिन होता है। यह अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में हो जाता है। शिथिल प्रयत्नवाला व्यक्ति भी अनेक जन्म के अभ्यास से वही पहुचं जाता है। जिसका नाम परमगति अथवा परमधाम है तपस्वियों, ज्ञानर्मािगयों तथा केवल र्किमयों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिये अर्जुन! तू योगी बन। समर्पण के साथ अन्तर्मन से योग का आचरण कर। प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रमुख रूप से योग की प्राप्ति के लिये अभ्यास पर बल दिया। अत: इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “अभ्यासयोग” नामक छठाँ अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-0757 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-05 (Part-05) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-05 (Part-05) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ५ सारांश / निष्कर्ष :- यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कभी तो आप निष्कर्म कर्मयोग की प्रशंसा करते है और कभी आप सन्यास मार्ग से कर्म करने की प्रशंसा करते है, अत: दोनों में एक को, जो आपने सुनिश्चित किया हो, परमकल्याणकारी हो, उसे कहिये। श्रीकृष्ण ने बताया – अर्जुन परमकल्याण तो दोनों में है। दोनों में वही निर्धारित यज्ञ की क्रिया ही की जाती है, फिर भी निष्काम कर्मयोग विशेष है। बिना इसे किये सन्यास ( (शुभाशुभ कर्मो का अंत ) नहीं होता। सन्यास मार्ग नहीं, मंजिल का नाम है। योगयुक्त ही सन्याशी योगयुक्त के लक्षण बताये की वही प्रभु है। वह न कुछ करता है, न कुछ करता है, बल्कि स्वभाव में प्रकृति के दबाव के अनुरूप लोग व्यस्त है। जो साक्षात् मुझे जान लेता है वही ज्ञाता है, वही पंडित है। यज्ञ के परिणाम में लोग मुझे जानते है। श्वास-प्रश्वास का जप और यज्ञ – तप जिसमें विलय होते है, मैं ही हूँ अर्थात् श्रीकृष्ण जैसा, महापुरुष – जैसा स्वरूप उस प्राप्ति वाले को भी मिलता है। वह भी ईश्वरों का ईश्वर, आत्मा का भी आत्मस्वरूपमय हो जाता है, उस परमात्मा के साथ एकीभाव पा लेता है। ( एक होने में जन्म चाहे जितने लगे। ) इस अध्याय मे स्पष्ट किया कि यज्ञ-तपो का भोक्ता, महापुरुषो के भी रहने वाली शक्ति महेश्वर है, अत: इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर” नामक पंचम अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-0643 minDevotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-04 (Part-04) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-04 (Part-04) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ४ सारांश / निष्कर्ष :- यज्ञकर्म स्पष्टीकरण इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस योग को आरम्भ में मैने सूर्य के प्राप्ति कहा, सूर्य ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु के प्रति कहा और उन से राजर्षियों ने जाना। मैंने अथवा अव्यक्त स्थितिवाले ने कहा। महापुरुष भी अव्यक्त स्वरूपवाला ही है। शरीर तो उसके रहने का मकान मात्र है। ऐसे महापुरुष की वाणी में परमात्मा ही पर्वह्वित होता है। ऐसे किसी महापुरुष से योग सूर्य द्वारा संचारित होता है। उस परम प्रकाश रूप का प्रसार सूरा के अन्तराल में होता है इसलिये सूर्य के प्रति कहा है। श्वास में संचारित होकर वे संस्काररूप में आ गये। सूरा में संचित रहने पर, समय आने पर वही मन में संकल्प बनकर आ जाता है। उसकी महत्ता समझने पर मन में उस वाक्य के प्रति इच्छा जाग्रत होती है और योग कार्य रूप ले लेता है। क्रमश: उत्थान करते करते यह योग ऋद्धियों-सिद्धियों की राजर्षित्व श्रेणी तक पहुचने पर नष्ट होने की स्थिति में पहुच जाता है, किन्तु जो प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है उसे महापुरुष ही सभाल लेते है। अर्जुन के प्रश्न करने पर कि आप का जन्म तो अब हुआ है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया अव्यक्त, अविनाशी, अजन्मा और सम्पूर्ण भूतो में प्रवाहित होने पर भी आत्ममाया, योग-प्रक्रिया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकति को वश में करके मैं प्रकट होता हूँ। प्रकट हो के करते क्या है? साध्य वस्तुओ को परित्राण देने तथा जिनसे दूषित उत्पन्न होते है। उनका विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा को स्थिर करने के लिये मैं आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त पैदा होता है। मेरा वह जन्म और कर्म दिव्य है। उसे केवल तत्वदर्शी ही जान पाते है। भगवान का आविर्भाव तो कलियुग की अवस्था से ही हो जाता है, यदि सच्ची लगन हो, किन्तु आरंभिक साधक समझ ही नहीं पाता कि भगवान बोल रहे है या योही संकेत मिल रहे है। आकाश से कोन बोलता है? महाराज जी बताते थे कि जब भगवान कृपा करते है, आत्मा से रथी हो जाते है तो खम्बे से, वृक्ष से, पत्ते से, शून्य से हर स्थना से बोलते और सँभालते है। उत्थान होते – होते जब परमतत्व परमात्मा विदित हो जाये, तभी स्पर्श के साथ ही वह स्पष्ट समझ पाता है। इसलिये अर्जुन! मेरे उस स्वरुप को तत्त्वदर्शियों ने देखा और मुझे जानकर वे तत्क्षण मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते है, जहा से पुन: आवागमन में नहीं आते। इस प्रकार उन्होंने भगवान के आविर्भाव की विधि को बताया कि वह किसी अनुरागी के ह्रदय में होता है, बाहर कदापि नहीं। श्रीकृष्ण ने बताया मुझे कर्म नहीं बाँधते और इस स्तर से जो जानता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। यही समझकर मुमुक्षु पुरुषो ने कर्म का आरम्भ किया था कि उस स्तर से जानने वाला वह पुरुष, और जान लेने पर वैसा ही वह मुमुक्षु अर्जुन। यह उपलब्धि निश्चित है, यदि यज्ञ किया जाय। यज्ञ का स्वरूप बताया। यज्ञ का परिणाम परमतत्व परमशांति बताया। इस ज्ञान को पाया कहा जाये? इस पर किसी तत्वदर्शी के पास जाने और उन्ही विधियों से पेश आने को कहा, जिससे में महापुरुष अनुकुल हो जायं। योगेश्वर ने स्पष्ट किया वह ज्ञान तू आचरण करके पायेगा, दुसरे के आचरण से तुझे नहीं मिलेगा। वह भी योग की सिद्धि के काल में प्राप्त होगा, प्रारम्भ में नहीं। वह ज्ञान (साक्षात्कार) हृदय-देश मैं होगा, बाहर नहीं। श्रद्धालु, तत्पर, संयतेन्द्रिय एवं संशयरहित पुरष से ही प्राप्त करता है। अत: ह्रदय में स्थित अपने संशय को वैराग्य की तलवार से काट। यह ह्रदय देश की लडाई है। बाह्य युद्ध से गीतोक्त युद्ध का कोई पर्योजन नहीं है। इस अध्याय योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मुख्य रूप से यज्ञ का स्वरूप स्पष्ट किया। और बताया की यज्ञ जिससे पूरा होता है, उसे करने (कार्य-प्रणाली) का नाम कर्म है। कर्म को भली प्रकार इसी अध्याय में स्पष्ट किया। अत: इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “यज्ञकर्म स्पष्टीकरण” नामक चौथा अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-051h 31Devotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-03 (Part-03) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-03 (Part-03) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग ३ सारांश / निष्कर्ष :- शत्रुविनाश – प्रेरणा बहुधा गीता प्रेमी व्याख्याताओं ने इस अध्याय को कर्म योग का नाम दिया है, किन्तु ये सांगत नहीं है। दुसरे अध्याय में योगेश्वर ने कर्म का नाम लिया है। उन्होंने कर्म के महत्व का प्रतिपादन कर उसमे कर्मजिज्ञासा जाग्रत की और इस अध्याय में उन्होंने कर्म को परिभाषित किया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। सिद्ध है कि यज्ञ कोई निर्धारित दिशा है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है, वह इसी लोक का बंधन है। श्रीकृष्ण जिसे कहेंगे, वह कर्म “मोक्ष्यसेऽशुभात्” संसार बंधन से छुटकारा दिलाने वाला कर्म है। श्रीकृष्ण ने यज्ञ की उत्पति को बताया। वह देता क्या है? उसकी विशेषताओ का चित्रण किया। यज्ञ करने पर बल दिया। उन्होंने कहा, इस यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। जो नहीं करते वे पापायु, आराम चाहने वाले व्यर्थ जीते है। पूर्व में होने वाले महाऋषिओ ने भी इसे करके ही परम नैष्कर्म्य सिद्धि को पाया। वे आत्मतृप्त है, उनके लिए कर्म की आवश्यकता नहीं है, फिर भी पीछे वालो के मार्ग दर्शन के लिए वे भी कर्म में भली प्रकार लगे रहते है। उन महापुरुषों से श्रीकृष्ण ने अपनी तुलना की, कि मेरा भी अब कर्म करने से कोई परियोजन नहीं है। किन्तु में भी पीछे वालो के हित के लिये कर्म में बरतता हूँ। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट अपना परिचय दिया कि वे एक योगी थे। उन्होंने कर्म में प्रवृत्त साधको को चलायमान न करने को कहा, क्योकि कर्म करके ही उन साधको को स्थिति प्राप्त करनी है। यदि नहीं करोगे तो नष्ट हो जाओगे। इस कर्म के लिये ध्यानस्थ होकर युद्ध करना है। आंखे बंद है, इन्द्रियों से सिमटकर चित्त का निरोध हो चला तो युद्ध कैसा? उस समय काम-क्रोध, राग-द्वेष बाधक होते है। इन विजातीय प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। आसुरी सम्पद कुरुक्षेत्र, विजातीय प्रवृत्ति को शनै:-शनै: छाँटते हुए ध्यानस्थ हो जाना ही युद्ध है। वस्तुत: ध्यान में ही युद्ध है। यही इस अध्याय का सारांश है, जिसमे न कर्म बताया न यज्ञ। यही यज्ञ समझ में आ जाये तो कर्म समझ में आ जाये, अभी तो कर्म समझाया ही नहीं गया है। इस अध्याय मे केवल स्थितप्रज्ञ महापुरुष के प्रशिक्षणात्मक पहलु पर बल दिया गया है। यह तो गुरुजानो के लिए निर्देश है। वह न भी करे तो उन्हें क्षति नहीं और न ही ऐसा करने में उनका अपना कोई लाभ ही है। किन्तु जिन साधको को परमगति अभीष्ट है। उनके लिये विशेष कुछ कहा ही नहीं, तो ये कर्म योग कैसे है? कर्म स्वरूप भी स्पष्ट नहीं है, जिसे किया जाये, क्योकि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। अभी तक उन्होंने इतना ही बताया। यज्ञ तो बताया ही नहीं, कर्म का स्वरूप स्पष्ट कहा हुआ? हाँ, युद्ध का यथार्थ चित्रण गीता मे यही पाया जाता है। सम्पूर्ण गीता पर दृष्टिपात करें तो अध्याय दो में कहा की शरीर नाशवान है, अत: युद्ध कर। गीता में युद्ध का यही ठोस कारण बताया गया। आगे ज्ञानयोग के सन्दर्भ में क्षत्रिय के लिए युद्ध ही कल्याण का एकमात्र साधन बताया और कहा की यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कोन सी बुद्धि ? यही की हर जीत दोनों दृष्टियों में लाभ ही है, ऐसा समझकर युद्ध कर। फिर अध्याय चार में कहा कि योग में स्थित रहकर हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार द्वारा काट। वह तलवार योग में है। अध्याय पाचं से दस तक युद्ध की चर्चा तक नहीं है। ग्यारहवें अध्याय में केवल इतना कहा है कि ये शत्रु मेरे द्वारा पहले ही मारे गये है, तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर हो जा। यश को प्राप्त कर। ये तुम्हारे बीना भी मरे हुए है, प्रेरक करा लेगा। तू इन मुर्दों को ही मार। अध्याय पन्द्रह में संसार सुविरूढ़ मूलवाला पीपल वृक्ष-जैसा कहा गया, जिसे असंगतारूपी शस्त्र द्वारा काटकर उसपर परमपद पर खोजने का निर्देश मिला। आगे के अध्यायों में युद्ध का उलेख नहीं है। अध्याय सोलह में असुरो का चित्रण अवश्य है, जो नरक गामी है। अध्याय तीन में ही युद्ध का विशद चित्रण है। श्लोक ३० से श्लोक ४३ तक युद्ध का स्वरूप, उनकी अनिवार्यता, युद्ध न करने वालो का विनाश, युद्ध में मारे जाने वाले शत्रुओं के नाम, उन्हें मरने के लिए अपनी शक्ति का आह्वान और निश्चय ही उन्हें काट कर फेकने पर बल दिया। इस अध्याय में शत्रु और शत्रु का आन्तरिक स्वरूप स्पष्ट है, जिनके विनाश की प्रेरणा दी गई है। अत:– इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “शत्रुविनाश-प्रेरणा” नामक तीसरा अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-041h 18Devotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-02 (Part-02) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-02 (Part-02) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग २ सारांश / निष्कर्ष :- कर्म – जिज्ञासा प्रायः कुछ लोग कहते है, कि दूसरे अध्याय में गीता पूरी हो गयी। किन्तु केवल कर्म का नाम मात्र लेने से कर्म पूरा हो जाता हो। तब तो गीता का समापन माना जा सकता है। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यही बताया है कि अर्जुन निष्काम कर्म के विषय में सुन, जिसे जानकर तू संसार बंधन से छुट जायेगा। कर्म करने में तेरा अधिकार है, फल मे कभी नहीं। कर्म करने मे तेरी (असरधा) भी न हो। निरन्तर करने के लिए तत्पर हो जाता है। इसके परिणाम में तू परम पुरुष का दर्शन कर स्थितप्रज्ञ बनेगा। यह संख्यायोग्य नामक अध्याय नहीं है। यह नाम शाश्त्र्कार का नहीं, अपितु टिकाकरो की देन है। वे अपनी बुधि के अनुसार ही ग्रहण करते है तो आश्चर्य क्या है। इस अध्याय में कर्म की गरिमा, उसे करने मे बरती जानेवाली सावधानी और स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन में कर्म के प्रति उत्कंठा जाग्रत की है, उसे कुछ प्रश्‍न दिये है। आत्मा शाश्‍वत है, सनातन है, उसे जानकर तत्वदर्शी बनो। उसकी प्राप्ति के दो साधन है, ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोग। अपनी शक्ति को समझकर, हानि लाभ का स्वयं निर्णय लेकर कर्म में परवर्त होना ज्ञानीमार्ग है तथा इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ उसही कर्म में प्रवृत्त होना ज्ञानमार्ग है। तथा इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ उसी कर्म में प्रवृत्त होना निष्काम कर्ममार्ग या भक्तिमार्ग है। गोस्वामी तुलसीदास ने दोनों का चित्रण इस परकार किया है। मेरे दो प्रकार के भजने वाले है एक ज्ञानमार्गी दूसरा भक्तिमार्गी। निष्काम ज्ञानमार्गी या भक्तिमार्गी शरणागत होकर मेरा आश्रय लेकर चलता है। ज्ञानयोगी अपनी शक्ति सामने रखकर, अपने लाभ हानि का विचार कर अपने भरोसे चलता है, जबकी दोनों के सत्रु एक ही है। ज्ञानमार्गी को काम, क्रोधदि शत्रुओं पर विजय पाना है। और निष्काम कर्मयोगी को भी इन्ही से युद्ध करना है। कामनायो का त्याग दोनों करते है और दोनों मार्गो में क्या जानेवाला कर्म भी एक ही है। इस कर्म के परिणाम में परमशान्ति को प्राप्त हो जाओगे लेकिन यह नहीं बताया की कर्म है क्या? अब आपके भी समक्ष कर्म एक प्रश्न है। अर्जुन के मन में भी कर्म के प्रति जिज्ञासा हुई। तीसरे अध्याय के आरंभ में ही उसने कर्मविषयक प्रश्न प्रस्तुत किया। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में कर्म – जिज्ञासा नामक दूसरा अध्याय पूर्ण होता है।
2021-01-031h 56Devotional Lovers
Devotional LoversShrimad Bhagavad Gita Chapter-01 (Part-01) in Hindi PodcastShrimad Bhagavad Gita Chapter-01 (Part-01) in Hindi Podcast भागवत गीता भाग १ सारांश / निष्कर्ष :- संशय विषाद योग गीता क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ के युद्ध का निरूपण है। यह ईश्वररिय विभूतियों से संपन्न भगवत स्वरुप को दिखाने वाला गायन है। यह गायन जिस क्षेत्र में होता है वह युद्ध क्षेत्र शरीर है। जिसमें दो प्रवृतियां हैं धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र, उन सेनाओं का स्वरुप और उनमें बल का आधार बताया। शंख ध्वनि से उनके पराक्रम की जानकारी मिली। तदंतर जिस सेना से लड़ना है उनका निरीक्षण हुआ जिसकी गणना 18 अक्षरिय अथात् लगभग साढॆ ६ अरब कही जाती है। किंतु वस्तुतः वे अनंत है। प्रकृति के दृष्टिकोण २ है। एक स्टोन मुखी प्रवृत्ति देविय संपत और दूसरी बहिर्मुखी प्रवृत्ति आसुरी संपत दोनों प्रवृत्ति ही है। एक ईष्ट ओर सम्मुख करती है। परम धर्म परमात्मा की ओर ले जाती है और दूसरी प्रकृति में विश्वास दिलाती है पहली देवीय संपत को साधकर आसुरी संपत का अंत किया जाता है। फिर शाश्वत पराव्रहम के दर्शन और उसमें स्थिति के साथ अव्यक्त शेष हो जाती है, युद्ध का परिणाम निकल आता है। अर्जुन को सैन्य निरीक्षण में अपना परिवार ही दिखाई पड़ता है। जिसे मारना है जहां तक संबंध है उतना ही जगत है। अनुराग के प्रथम चरण में परिवारिक मोह बाधक बनता है। साधक जब देखता है कि मधुर संबंधों में इतना विच्छेद हो जाएगा जैसे वे थे ही नही। तो उसे घबराहट होने लगती है स्वजना शक्ति को मरने में उसे अक्लियान दिखाई देने लगता है। वह अप्रचलित रूढ़ियों में अपना कल्याण ढूंढने लगता है जैसा अर्जुन ने किया उसने कहा कुलधर्म ही सनातन धर्म है। इस युद्ध से सनातन धर्म नष्ट हो जाएगा। कुल की स्त्रियां दूषित हो जाएंगी वरुण शंकर पैदा होगा जो कूल और कुल धातियों को अनंत काल तक नरक में ले जाने के लिए ही होता है। अर्जुन अपनी समझ से सनातन धर्म की रक्षा के लिए विकल है उस ने श्री कृष्ण से अनुरोध किया कि हम लोग समझदार होकर के भी यह महान पाप क्यों करें अथार्त श्रीकृष्ण भी पाप करने जा रहे है। पाप से बचने के लिए मैं युद्ध नहीं करूंगा  ऐसा कहता हुआ हवास अर्जुन रथ के पिछले भाग में बैठ गया। क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ के संघर्ष से पीछे हट गया। टीकाकारों ने इस अध्याय को अर्जुन का विष्णाज्ञय योग कहा है। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है सनातन धर्म के लिए विकल होने वाले अनुरागी का विषाद योग का कारण बनता है यही विषाद मनु को हुआ था। संशय मैं पढकर ही मनुष्य विसाध करता है। उसे संदेह था कि वरुण शंकर पैदा होगा जो नरक में ले जायेगा। सनातन धर्म के नष्ट होने का विषाद था। अतः संशय विषाद योग का समान्य नामकर्ण इस अध्याय के लिए उपुक्त है।
2021-01-021h 28Devotional Lovers2020-12-2520 minDevotional Lovers2020-12-2508 minDevotional Lovers2020-12-2507 minDevotional Lovers2020-12-2506 minDevotional Lovers2020-12-2507 minDevotional Lovers2020-12-2509 minDevotional Lovers2020-12-2505 minDevotional Lovers2020-12-2517 minDevotional Lovers2020-12-2511 minDevotional Lovers2020-12-2508 minDevotional Lovers2020-12-2508 minDevotional Lovers2020-12-2507 minDevotional Lovers2020-12-2512 minDevotional Lovers2020-12-2508 minDevotional Lovers2020-12-2511 minDevotional Lovers2020-12-2511 minDevotional Lovers2020-12-2516 minDevotional Lovers2020-12-2510 minDevotional Lovers2020-12-2503 minDevotional Lovers2020-12-2017 minDevotional Lovers2020-12-2014 minDevotional Lovers2020-12-1916 minDevotional Lovers2020-12-1915 minDevotional Lovers2020-12-1918 minDevotional Lovers2020-12-1812 minDevotional Lovers2020-12-1830 minDevotional Lovers2020-12-1825 minDevotional Lovers2020-12-1727 minDevotional Lovers2020-12-1723 minDevotional Lovers2020-12-1723 minDevotional Lovers2020-12-1738 minDevotional Lovers2020-12-1726 minDevotional Lovers2020-12-1744 minDevotional Lovers2020-12-1740 minDevotional Lovers2020-12-171h 00Devotional Lovers2020-12-1745 minDevotional Lovers2020-12-1727 minDevotional Lovers2020-12-1450 minDevotional Lovers2020-12-1222 minDevotional Lovers2020-12-0812 minDevotional Lovers2020-11-2636 min